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वैज्ञानिक - श्री नबी नारायण जी

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जरा कल्पना किजीऐ... आपने अपनी पुरी जवानी देश को महत्वपुर्ण तकनीक देने में लगा दी हैं और जब आप की सेवा के मात्र 15 वर्ष बचे हो तब आप खुद को हथकडीयों में बधा हुआ नग्न अवस्था में एक ऐसे बन्द कमरे में पाये जहाँ सिर्फ चार पुलिस कर्मी हो और कुछ नहीं ये कहानी नबी नरायण कि हैं ये भारत के रोकेट वैज्ञानिक थें और सबसे बडी बात ये है कि जिस समय इन्हे नगां कर के पुलिस कस्टडी में पीटा जा रहा था तब ये भारत को एक बडी महत्वपुर्ण और जटिल तकनिक देने की दहलीज पर थें नवी नारायण को धमकी दी जा रही थी कि अगर उन्होंने पुलिस द्वारा कहे जाने वाली बातें नहीं मानी तो उनको जम्मू-कश्मीर ले जाकर पहाड़ से गिरा दिया जाएगा जिस समय नवीन नारायण को प्यास लगती थी तो उनसे सिर्फ 1 मीटर दूर पानी की ठंडी बोतल रखी जाती थी नबी नारायण जी को बांधकर रखा जाता था और उनकी हाथ उस बोतल तक नहीं पहुंच पाते थे लेकिन बड़ी बात यह पता करना है कि उनके साथ ऐसा हुआ क्यों था और क्या कारण थे कि एक भारतीय वैज्ञानिक जो इतनी महत्वपूर्ण कार्य में लगा हुआ था उसके साथ ऐसा व्यवहार किया गया. यह उस समय की बात है जब भारत अपना खुद का एक शक्तिशाली र...

वो याद आती है....!

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मैं सहेज कर रखूँगा सर्वदा उन पलों को जब आखिरी बार उसने अपने पूरेपन से समेट लिया था अपने में मुझे और दूर कहीं हमारे मिलन की खुशी में चहचहाने लगी थी चिड़ियाएं ऐसा नहीं है कि मैं भूलने की कोशिश नहीं करता हूँ उसे भूलने की उत्कट कोशिश करता हूँ पर भूल कहाँ पाता हूँ उसे इस असफल कोशिश में वह और भी उत्कटता से याद आती है मुझे ✍रुद्र तश्वीर-: गूगल से लिया गया

भारतीय मंदिरों के बारे में हैरान करने वाले कुछ रोचक तथ्य क्या हैं?

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भारतीय मंदिरों के बारे में हैरान करने वाले कुछ रोचक तथ्य- मुझे लगता है कि हमारे पूर्वजों के पास रॉक पिघलने या रॉक सॉफ्टनिंग तकनीक के समान कुछ था। नीचे कुछ घटनाएं दी गई हैं जिन्हें आधुनिक विज्ञान भी नहीं समझा सकता। हालांकि प्रत्येक भारतीय प्राचीन हिंदू मंदिर अपने आप में कई तरह के शोध पत्रों में है। मैं बहुत ही अजीब पत्थर संरचनाओं को दिखाऊंगा जिसे आधुनिक तकनीक द्वारा भी समझाया नहीं जा सकता है। यहाँ पहला सबूत है। यहां एक शेर की मूर्ति का एक चित्र है, जिसके मुंह के अंदर एक पत्थर की गेंद है। पत्थर की गेंद को बाहर नहीं निकाला जा सकता है। यह असंभव नहीं है। लेकिन मुख्य समस्या यह है कि पत्थर की गेंद मूर्ति को तराशने में प्रयुक्त मूल चट्टान की तुलना में अलग पत्थर की है। ऐसा कोई तरीका नहीं है जिससे चट्टान को पिघलाए बिना इसे बनाया जा सके। दूसरा प्रमाण उपरोक्त तस्वीर हम्पी में संगीत मंदिर की है। मूल रूप से एक ही चट्टान से 7 स्तंभ उकेरे गए थे और एक ही लंबाई और व्यास के बावजूद, वे सभी अलग-अलग ध्वनि उत्पन्न करते हैं (सा रे गा मा पा दे नी सा)। ब्रिटिश लोग इस घटना पर ...

चलो कोई वजह ढूँढते हैं!

चलो हसने की कोई वजह ढूंढते हैं, जिधर ना हो कोई गम ऐसी जगह ढूंढते हैं! बहुत भटक लिए ज़िन्दगी के दौड़ में, कहीं सुकून से बैठने की जगह ढूंढते हैं! मतलबी लोगों के बीच, कोई साथ चलने वाला हमसफ़र ढूंढते हैं! अनजान सी गलियो में कहीं, मंज़िल को पाने का रास्ता ढूढते हैं! दूर हुए दोस्तों के साथ, मुलाकात करने की वजह ढूंढते हैं! किसी अनजान की मदद कर, उसके मुस्कुराने की वजह ढूंढते हैं! बहुत उड़ लिए आसमान में, चलो कहीं जमीन पर सतह ढूंढते हैं! रात के अंधेरों में, चांद की रोशनी ढूंढते हैं! जीने की कशमकश में, खुशियों की लहर ढूढते है! वीडियो कॉल के जमाने में, अपने से मिलने की कोई वज़ह ढूंढते हैं! ऑनलाइन खाना मंगा के खाने के चलन में, कभी खुद बनाने का मौका ढूंढते हैं! खुद की ख्वाहिश को पीछे रख, कभी मां बाप की खुशियों की वजह ढूंढते हैं! मन की उलझनों से उभरकर, चलो कहीं चैन से रहने की जगह ढूंढते हैं! बहुत वक्त गुजर गया भटकते हुए अंधेरों में, चलो इस अंधेरी रात की हम सुबह ढूंढते हैं

रिश्ता

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रिश्ता  प्रेम में डूबे पुरुष थोड़ा सुलझकर सिमट जाते हैं। प्रेम में डूबी स्त्री खोल देती है अपनी सारी गिरहें। स्त्री कैलेण्डर समेट लेती है सारी मुलाक़ातें अधूरी-पूरी बातें,  पहला स्पर्श , चुंबन और आलिंगन,  धड़कनों की रफ़्तार सांसों का स्पंदन। पुरुष को याद रहता है सिर्फ़ वो नाम और उसकी अधरों पर मचलकर खिलती मुस्कान। पुरुष अपने अधूरे अरमान तकियों को सुनाते हैं दीवारों को देखकर मुस्कुराते हैं गर्म चाय ठंडी पी जाते हैं। स्त्री करती है चांद से बातें देखती है इंद्रधनुषी सपने उंगलियों से लिखती है ख़त आसमान पर। स्त्री प्रेम में निखर जाती है जैसे सूरज की लालिमा छनकर आ गयी हो उसके कपोलों पर। पुरुष घंटों गुज़ार देते हैं आईने के सामने समझते हुए चेहरे की रोशनी का गणित।दस बार तह करते हैं वही कपड़े ख़्याल रखते हैं सिलवटों का। स्त्री का कमरा हो जाता है मीना बाज़ार अब वो ठीक करती है सिर्फ़ वही सिलवटें जिन्हें वह चूमकर मिटा सके पुरुष के माथे से।

जिंदगी यूँ चल तो रही है

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बहोत ज्यादा डगमगाते हुए संभल तो रही है ज़िन्दगी यूँ चल तो रही है रास्ते जाने अनजान ही सही बदल तो रही है ज़िन्दगी यूँ चल तो रही है हज़ारों ख्वाहिशें पूरी ना हुई नई पल तो रही है ज़िन्दगी यूँ चल तो रही है दुख है, दर्द है, तकलीफ़े भी है खुशियाँ मचल तो रही है ज़िन्दगी यूँ चल तो रही है मेरे जैसो की कमी नहीं है यहाँ बात ये खल तो रही है ज़िन्दगी यूँ चल तो रही है रोज़ नई सी आश लिए होता हूँ मगर बकवास चल तो रही है ज़िन्दगी यूँ चल तो रही है |

पता नही क्यूँ हूँ!

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यूँ हूँ  क्यूँ हूँ  नहीं पता क्यूँ हूँ  मरा हूँ  खरा हूँ  गले तक भरा हूँ  मन हूँ  तन हूँ  बेपरवाह मगन हूँ  दर्द हूँ  चुभन हूँ  मैं अकेलापन हूँ  यूँ हूँ  क्यूँ हूँ  नहीं पता क्यूँ हूँ

अनुभव

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अनुभव यकायक एक शख्स सीट से उठा और जोर से चिल्लाया..  "ट्रेन रोको" कोई कुछ समझ पाता उसके पूर्व ही उसने ट्रेन की जंजीर खींच दी..ट्रेन रुक गईं..!! ट्रेन का गार्ड दौड़ा-दौड़ा आया। कड़क आवाज में पूछा..  किसने ट्रेन रोकी..?? कोई अंग्रेज बोलता उसके पहले ही, वह शख्स बोल उठा..  "मैंने रोकी श्रीमान".. पागल हो क्या ? पहली बार ट्रेन में बैठे हो ? तुम्हें पता है, बिना कारण ट्रेन रोकना अपराध हैं..गार्ड गुस्से में बोला..!! हाँ श्रीमान ज्ञात है किंतु, मैं ट्रेन न रोकता तो सैकड़ो लोगो की जान चली जाती..!! अब तो जैसे अंग्रेजों का गुस्सा फूट पड़ा। सभी उसको गालियां दे रहे थे..गंवार, जाहिल जितने भी शब्द शब्दकोश मे थे, बौछार कर रहे थे..किंतु वह शख्स गम्भीर मुद्रा में शांत खड़ा था,मानो उस पर किसी की बात का कोई असर न पड़ रहा हो..उसकी चुप्पी अंग्रेजों का गुस्सा और बढा रही थी..!! किस्सा दरअसल आजादी से पहले, ब्रिटेन का है..!!ट्रेन अंग्रेजों से भरी हुई थी। उसी ट्रेन के एक डिब्बे में अंग्रेजों के साथ एक भारतीय भी बैठा हुआ था..!! उस शख्स की बात सुनकर सब जोर-जोर से हंसने लगे। किँतु उसने बिना ...

जीवन यथार्थ

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जीवन यथार्थ चलो मन जाये घर अपने...! सारे पराये हैं कौन है अपने.....!! इन दो पंक्तियों में जीवन का सम्पूर्ण घटनाक्रम परिभाषित है और इस घटनाक्रम को अगर जानना है, तो जो घटित घटनाक्रम है, उस घटित हुई घटनाक्रम का अवलोकन करना होगा और जब अवलोकन करने पर घटनाक्रम का परिणाम जो सामने आएगा, वह बड़ा आश्चर्य कर देना वाला होगा।  हमारी सारी इच्छाये पराई है, बिना हित की है और इन इच्छाओ ने सदैव तुम्हे भृम जालों में उलझाया है और इस भृम से जो भेद उत्पन्न हुए है तेरे मेरे के, इस से जीवन की दशा व दिशा दोनों ही वास्तविक घर के विपरीत दिशा में चल पड़ी है।  अब इस इच्छा को भी गहराई से समझ लेना, इच्छाओं के अस्तित्व को भी अच्छे से जान लेना, यह इच्छाएं जो जन्म लेती है, यह झूठे अंहकार की तृप्ति के आधार पर जन्म लेती है, दुसरो को प्रभावित करने के लिए जन्म लेती है, स्वयं को स्वयं के रचे माया जाल में उलझाने के लिए जन्म लेती है और फिर कुछ समय के पश्चात तुम्हे छोड़कर विदा हो जाती है और फिर दूसरे रूप में प्रकट हो जाती है।  आपके जो इस मानव परिवेश में जो रिश्ते है, यह भी सारी इच्छाओं के आधार पर ही तो ख...

प्रसाद - भगवान को भोग लगाना

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ॐ श्री गुरुवे नमः। ॐ नमः शिवाय क्या भगवान हमारे द्वारा चढाया गया भोग खाते हैं? यदि खाते हैं तो वह वस्तु खत्म क्यों नहीं हो गई? एक लड़के ने अपने गुरु से ऐसा प्रश्न किया। गुरु ने कुछ समाधान नहीं दिया। पाठ पढ़ाते रहे। उस दिन पाठ में एक श्लोक सिखाया। पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥ पाठ पूरा होने पर सभी को कहा कि पुस्तक देखकर श्लोक कंठस्थ करलें।  थोड़ी देर बाद प्रश्न करने वाले शिष्य के पास जाकर पूछा कि श्लोक कंठस्थ हुआ कि नहीं। तब उस शिष्य ने पूरा श्लोक सही सही सुना दिया। फिर भी गुरु ने सर नहीं में हिलाया। तो शिष्य ने कहा कि- “चाहे तो पुस्तक देख लें। श्लोक सही है।” तो गुरु ने कहा-“अरे श्लोक तो पुस्तक में ही है। तो तुम्हें कैसे आ गया?” तो शिष्य कुछ कह नहीं पाया।  गुरु  ने कहा- “पुस्तक में जो श्लोक है वह स्थूल स्थिति में है। तुम ने जब पढ़ा तो वह सूक्ष्म स्थिति में अंदर प्रवेश कर गया। उसी स्थिति में तुम्हारा मन रहता है। इतना ही नहीं, तुम जब इसको पढ़कर कंठस्थ करते हो, तो पुस्तक में जो स्थूल स्थिति का श्लोक है उसमें कोई ...

महान कौन?

गोडसे Vs गांधी पाकिस्तान  से दिल्ली की तरफ जो रेलगाड़िया आ रही थी, उनमे हिन्दू इस प्रकार बैठे थे जैसे माल की बोरिया एक के ऊपर एक रची जाती हैं. अन्दर ज्यादातर मरे हुए ही थे, गला कटे हुए l रेलगाड़ी के छप्पर पर बहुत से लोग बैठे हुए थे, डिब्बों के अन्दर सिर्फ सांस लेने भर की जगह बाकी थी l बैलगाड़िया ट्रक्स हिन्दुओं से भरे हुए थे, रेलगाड़ियों पर लिखा हुआ था,," आज़ादी का तोहफा " रेलगाड़ी में जो लाशें भरी हुई थी उनकी हालत कुछ ऐसी थी की उनको उठाना मुश्किल था, दिल्ली पुलिस को फावड़ें में उन लाशों को भरकर उठाना पड़ा l ट्रक में भरकर किसी निर्जन स्थान पर ले जाकर, उन पर पेट्रोल के फवारे मारकर उन लाशों को जलाना पड़ा इतनी विकट हालत थी उन मृतदेहों की... भयानक बदबू...... सियालकोट से खबरे आ रही थी की वहां से हिन्दुओं को निकाला जा रहा हैं, उनके घर, उनकी खेती, पैसा-अडका, सोना-चाँदी, बर्तन सब मुसलमानों ने अपने कब्जे में ले लिए थे l #मुस्लिम_लीग ने #सिवाय_कपड़ों के कुछ भी ले जाने पर रोक लगा दी थी. किसी भी गाडी पर हल्ला करके हाथ को लगे उतनी महिलाओं- बच्चियों को भगाया गया. #बलात्कार किये बिना...

अनजान रिश्ता

अनजान रिश्ता ट्रैन के ए.सी. कम्पार्टमेंट में मेरे सामने की सीट पर बैठी लड़की ने मुझसे पूछा " हैलो, क्या आपके पास इस मोबाइल की पिन है??" उसने अपने बैग से एक फोन निकाला था, और नया सिम कार्ड उसमें डालना चाहती थी। लेकिन सिम स्लॉट खोलने के लिए पिन की जरूरत पड़ती है जो उसके पास नहीं थी। मैंने हाँ में गर्दन हिलाई और सीट के नीचे से अपना बैग निकालकर उसके टूल बॉक्स से पिन ढूंढकर लड़की को दे दी। लड़की ने थैंक्स कहते हुए पिन ले ली और सिम डालकर पिन मुझे वापिस कर दी। थोड़ी देर बाद वो फिर से इधर उधर ताकने लगी, मुझसे रहा नहीं गया.. मैंने पूछ लिया "कोई परेशानी??" वो बोली सिम स्टार्ट नहीं हो रही है, मैंने मोबाइल मांगा, उसने दिया। मैंने उसे कहा कि सिम अभी एक्टिवेट नहीं हुई है, थोड़ी देर में हो जाएगी। और एक्टिव होने के बाद आईडी वेरिफिकेशन होगा उसके बाद आप इसे इस्तेमाल कर सकेंगी। लड़की ने पूछा, आईडी वेरिफिकेशन क्यों?? मैंने कहा " आजकल सिम वेरिफिकेशन के बाद एक्टिव होती है, जिस नाम से ये सिम उठाई गई है उसका ब्यौरा पूछा जाएगा बता देना" लड़की बुदबुदाई "ओह्ह " म...

पलायन

पलायन 1990 के दशक में अमिताभ की एक फ़िल्म आई थी.... ""अग्निपथ"". उस समय तो नहीं... लेकिन, अभी हाल-फिलहाल में मुझे वो फ़िल्म टीवी पर देखने का मौका लगा.. उस फिल्म में अमिताभ एक डायलॉग बोलते हैं.... "सिर्फ, कहने को ये शहर है गायतोंडे साहब , लेकिन यहाँ आज भी जंगल का कानून चलता है. यहाँ, हर ताकतवर ... कमजोर को मार कर जीता है. चींटी को बिस्तुइया खा जाती है और बिस्तुइया को मेंढक खा है. मेंढक को सांप निंगल जाता है और सांप को नेवला फाड़ देता है. भेड़िया, नेवले का खून चूस लेता है और शेर भेड़िए को चबा जाता है. यहाँ... हर कोई अपने से कमजोर को मार कर जीता है. हालांकि.... ये कहने को तो सिर्फ एक फ़िल्म का डायलॉग है लेकिन.... हमारे समाज की यही अघोषित सच्चाई है.... पहले हम हिन्दू ... अफगानिस्तान से भागे और कारण बताया कि वहाँ मुसलमान बहुसंख्यक हो गए हैं और हमें चैन से जीने नहीं दे रहे हैं. उसके बाद 1947 में पाकिस्तान और बांग्लादेश से भागे...! तदुपरांत... कश्मीर, असम, कैराना और अब मेरठ...! पलायन का जगह बेशक हर समय अलग-अलग रहा लेकिन कारण हमेशा एक रहा कि......

लाडली

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------ #लाडली ----- शोकेस में रखी माँ की तस्वीर के साथ अब पिताजी की तस्वीर भी रख दी गई थी, उस पर भी फूल माला चढी हुई और सामने अगरबत्ती जल रही थी। कनिका सामने अपने बेड पर बैठी एकटक पिताजी के उस चित्र को देख रही थी। पिछले बीस दिनों में मानो उसकी ज़िन्दगी का चक्र ही स्थिर हो गया था, कई वर्ष पहले माँ के स्वर्गवास के बाद से ही पिताजी ने उसकी तथा भैया कपिल की पूरी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली थी। दोनों की सारी आवश्यकताएं ऑफिस जाने के साथ यथासमय पूरी करना ही उनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य हो गया था। कपिल तो लड़का था पर कनिका को भी कभी माँ की कमी महसूस नहीं होने दी पिताजी ने। कनिका यूँ तो हर तरह से सुखी संतुष्ट थी परन्तु कपिल का व्यवहार अक्सर उसे उदास कर देता था, हर बात में वह स्वयं को कनिका से श्रेष्ठ मानता था, अपने से 2 साल बड़े भाई से जैसे दोस्ताना व्यवहार की अपेक्षा किसी भी बहन को हो सकती थी वैसा कनिका को कपिल से कभी नहीं मिलता था। एक दिन तो तब हद ही हो गईं थी जब किसी बात पर होने वाली बहस बढ़ते बढ़ते शिकायत के रूप में पिताजी तक पहुँच गई, जब उन्होंने दोनों को समझाया तो कनिका तुरंत मान गई पर कप...

“सॉरी, रांग नम्बर”

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“हैलो...हैलो...अंकित बेटा...हम पहुँचने वाले हैं...ट्रेन आउटर पर खड़ी है।” “अच्छा पापा, मैं भी निकलता हूँ ऑफिस से, बस दस मिनट में स्टेशन पहुँच जाऊँगा। आप वेटिंग रूम में बैठ जाइएगा” कहकर अंकित ने फोन काट दिया। उधर ट्रेन में बैठे राजेन्द्र जी और उनकी पत्नी उर्मिला ने भी बड़े उत्साह से अपना बैग-अटैची सँभाल ली क्योंकि दिल्ली का स्टेशन आने वाला ही था। गाड़ी भी रेंगने लगी थी। उर्मिला ने बहुत गद्गद् होते हुए कहा, “पता ही नहीं चला कि पाँच साल कैसे बीत गये? लड्डू भी तो अब बोलने लगा है।” राजेन्द्र जी भी मुस्कुराकर बोले, “हाँ...अगर उसने फोन पर नहीं कहा होता कि ‘दादा दी तब आओदे’ ...तो मैं आता नहीं। पाँच साल में एकबार भी नहीं बुलाया अंकित और सलोनी ने।” “ओफ्फो! आप तो हर समय झुँझलाते ही रहते हैं। अरे बच्चे अपने काम में बिजी थे कि हमारी देखभाल करते। दोनों को ऑफिस जाना होता है। खाली घर में क्या करते हम? ठीक है, अब बुला लिया ना?” उर्मिला ने समझाते हुए कहा, “अच्छा सुनिए, उनके फंक्शन में कुछ भी हो ज्यादा टेंशन मत करना...दिल्ली का सिस्टम अलग है।” “हाँ-हाँ जानता हूँ...चलो प्लेटफार्म आ गया”...

आरक्षण

 हमें आरक्षण से कोई आपत्ति नहीं है !           समस्या तो यह है कि ~ जिसको आरक्षण दिया जा रहा है , वो सामान्य आदमी बन ही नहीं पा रहा है !         समय सीमा तय हो कि ~          वह सामान्य नागरिक           कब तक बन जायेगा ? किसी व्यक्ति को आरक्षण दिया गया और वो किसी सरकारी नौकरी में आ गया ! अब उसका वेतन ₹5500 से ₹50000 व इससे भी अधिक है , पर जब उसकी संतान हुई तो वह भी पिछडी ही पैदा हुई ,           और ... हो गई शुरुआत ! उसका जन्म हुआ प्राईवेट अस्पताल में ~   पालन पोषण हुआ राजसी माहोल में ~       फिर भी वह गरीब पिछड़ा और     सवर्णों के अत्याचार का मारा  हुआ ? उसका पिता लाखों रूपए सालाना कमा   रहा है , तथा उच्च पद पर आसीन है !     सारी सरकारी सुविधाएं  ले रहा है !            वो खुद जिले के ...  सबसे अच्छे स्कूल में पढ़ रहा है , और    सरकार ... उसे...

संगिनी

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पति पत्नी के बीच प्रेम क्या होता है कोई  विजेंद्र सिंह राठौड़ से सीखे ! यह तस्वीर अजेमर के निवासी विजेंद्र सिंह राठौड़ और उनकी धर्मपत्नी लीला की है। 2013 में लीला ने विजेंद्र से आग्रह किया के वह चार धाम की यात्रा करना चाहती हैं। विजेंद्र एक ट्रेवल एजेंसी में कार्यरत थे। इसी दरमियां ट्रैवेल एजेंसी का एक टूर केदारनाथ यात्रा जाने के लिये निश्चित हुआ। पतिपत्नी ने अपना बोरिया बिस्तर बांधा और केदारनाथ जा पहुंचे। विजेंद्र और लीला एक लॉज में रुके थे। लीला को लॉज में छोड़ विजेंद्र कुछ दूर ही गये थे के चारों ओर हाहाकार मच गई। उत्तराखंड में आई भीषण बाढ़ का उफनता पानी केदारनाथ आ पहुंचा था। विजेंद्र ने बामुश्किल अपनी जान बचाई। मौत का तांडव और उफनते हुये पानी का वेग शांत हुआ तो विजेंद्र बदहवास होकर उस लॉज की ओर दौड़े जहाँ वह लीला को छोड़ कर आये थे। परन्तु वहाँ पहुंच कर जो नज़ारा दिखा वह दिल दहला देने वाला था। सब कुछ बह चुका था। प्रकृति के इस तांडव के आगे वहां मौजूद हर इंसान बेबस दिख रहा था। तो क्या लीला भी ..... नहीं नहीं। ऐसा नहीं हो सकता।विजेंद्र ने अपने मन को समझाया। "वह जीवित है" विजे...

प्रभू का पत्र

प्रभू का पत्र मेरे प्रिय... सुबह तुम जैसे ही सो कर उठे, मैं तुम्हारे बिस्तर के पास ही खड़ा था। मुझे लगा कि तुम मुझसे कुछ बात करोगे। तुम कल या पिछले हफ्ते हुई किसी बात या घटना के लिये मुझे धन्यवाद कहोगे। लेकिन तुम फटाफट चाय पी कर तैयार होने चले गए और मेरी तरफ देखा भी नहीं!!! फिर मैंने सोचा कि तुम नहा के मुझे याद करोगे। पर तुम इस उधेड़बुन में लग गये कि तुम्हे आज कौन से कपड़े पहनने है!!! फिर जब तुम जल्दी से नाश्ता कर रहे थे और अपने ऑफिस के कागज़ इक्कठे करने के लिये घर में इधर से उधर दौड़ रहे थे... तो भी मुझे लगा कि शायद अब तुम्हे मेरा ध्यान आयेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। फिर जब तुमने आफिस जाने के लिए ट्रेन पकड़ी तो मैं समझा कि इस खाली समय का उपयोग तुम मुझसे बातचीत करने में करोगे पर तुमने थोड़ी देर पेपर पढ़ा और फिर खेलने लग गए अपने मोबाइल में और मैं खड़ा का खड़ा ही रह गया। मैं तुम्हें बताना चाहता था कि दिन का कुछ हिस्सा मेरे साथ बिता कर तो देखो, तुम्हारे काम और भी अच्छी तरह से होने लगेंगे, लेकिन तुमनें मुझसे बात ही नहीं ...

विश्वास

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मेरी बेटी की शादी थी और मैं कुछ दिनों की छुट्टी ले कर शादी के तमाम इंतजाम को देख रहा था. उस दिन सफर से लौट कर मैं घर आया तो पत्नी ने आ कर एक लिफाफा मुझे पकड़ा दिया. लिफाफा अनजाना था लेकिन प्रेषक का नाम देख कर मुझे एक आश्चर्यमिश्रित जिज्ञासा हुई. ‘अमर विश्वास’ एक ऐसा नाम जिसे मिले मुझे वर्षों बीत गए थे. मैं ने लिफाफा खोला तो उस में 1 लाख डालर का चेक और एक चिट्ठी थी. इतनी बड़ी राशि वह भी मेरे नाम पर. मैं ने जल्दी से चिट्ठी खोली और एक सांस में ही सारा पत्र पढ़ डाला. पत्र किसी परी कथा की तरह मुझे अचंभित कर गया. लिखा था : आदरणीय सर, मैं एक छोटी सी भेंट आप को दे रहा हूं. मुझे नहीं लगता कि आप के एहसानों का कर्ज मैं कभी उतार पाऊंगा. ये उपहार मेरी अनदेखी बहन के लिए है. घर पर सभी को मेरा प्रणाम. आप का, अमर. मेरी आंखों में वर्षों पुराने दिन सहसा किसी चलचित्र की तरह तैर गए. एक दिन मैं चंडीगढ़ में टहलते हुए एक किताबों की दुकान पर अपनी मनपसंद पत्रिकाएं उलटपलट रहा था कि मेरी नजर बाहर पुस्तकों के एक छोटे से ढेर के पास खड़े एक लड़के पर पड़ी. वह पुस्तक की दुकान में घुसते हर संभ्रांत व्यक्...