पलायन
पलायन
1990 के दशक में अमिताभ की एक फ़िल्म आई थी.... ""अग्निपथ"".उस समय तो नहीं... लेकिन, अभी हाल-फिलहाल में मुझे वो फ़िल्म टीवी पर देखने का मौका लगा..
उस फिल्म में अमिताभ एक डायलॉग बोलते हैं....
"सिर्फ, कहने को ये शहर है गायतोंडे साहब , लेकिन यहाँ आज भी जंगल का कानून चलता है.
यहाँ, हर ताकतवर ... कमजोर को मार कर जीता है.
चींटी को बिस्तुइया खा जाती है और बिस्तुइया को मेंढक खा है.
मेंढक को सांप निंगल जाता है और सांप को नेवला फाड़ देता है.
भेड़िया, नेवले का खून चूस लेता है और शेर भेड़िए को चबा जाता है.
यहाँ... हर कोई अपने से कमजोर को मार कर जीता है.
हालांकि.... ये कहने को तो सिर्फ एक फ़िल्म का डायलॉग है लेकिन.... हमारे समाज की यही अघोषित सच्चाई है....
पहले हम हिन्दू ... अफगानिस्तान से भागे और कारण बताया कि वहाँ मुसलमान बहुसंख्यक हो गए हैं और हमें चैन से जीने नहीं दे रहे हैं.
उसके बाद 1947 में पाकिस्तान और बांग्लादेश से भागे...!
तदुपरांत... कश्मीर, असम, कैराना और अब मेरठ...!
पलायन का जगह बेशक हर समय अलग-अलग रहा लेकिन कारण हमेशा एक रहा कि.... "मुसलीम हमें तंग कर रहे हैं", और हमें वहाँ रहना ... "सुरक्षित नहीं लग रहा" है.
हो सकता है कि.... आपकी बात सही हो और आपको ... सुरक्षा संबंधी चिंता सता रही हो... जिस कारण आप पलायन के लिए मजबूर हो गए हों...!
लेकिन...
आपने कभी सुना है कि... मुसलमानों से कहीं से पलायन किया हो ???
1947 में आजादी के बाद तो दंगे तो भारत और पाकिस्तान दोनों ही जगह हुए थे...
लेकिन, पाकिस्तान छोड़कर भागे सिर्फ हिन्दू...!
मुसरिम तो नहीं भागे हिंदुस्तान से ???
अब आप एक घटिया सा तर्क दोगे कि.... यहाँ , गांडी और निहारु ने उन्हें बचा लिया...!
लेकिन... क्या सच में ... ऐसा हुआ ???
क्या पाकिस्तान में.... जिन्ना ने हाथों में तलवार और भाला लेकर हिंदुओं को मारना शुरू कर दिया था.... जो, यहाँ हिंदुस्तान में .... गांडी और निहारु ने नहीं किया ????
सच को स्वीकारना सीखें ... क्योंकि, जबतक आप सच को स्वीकारेंगे नहीं... आप अपनी गलतियों को नहीं सुधार पाएंगे.
कोई भी... दंगा फसाद... सरकार नहीं करवाती है.... हाँ, सरकार का मौन समर्थन अथवा पक्षपाती रवैया जरूर हो सकता है.
खैर.... 1947 को जाने दें.... और, अभी हाल-फिलहाल की बात करें.
जब... देश में खान्ग्रेस की सरकार थी तो हम हिन्दू रोते थे कि.... भाई , अभी तो खान्ग्रेस की सरकार है... अभी क्या कर सकते हैं ????
फिर, मोदी की सरकार आई.... और, उसके बाद भी रोना बदस्तूर जारी है कि.... भाई, मोदिया तो सेक्युलर बन गया... हम क्या करें ...???
हकीकत तो यह है कि.... हम कुछ करना ही नहीं चाहते हैं सिवाए बहाना तलाशने के...!
असल में हम हिंदुओं की दिली इच्छा है कि.....
हम खुद से कुछ न करें और एक सुई तक न खटकाएँ...
कोई अवतार आ जाए और हमारे सारे दुश्मनों (जो कि अभी मुसरमान है) को मार कर हमारे लिए "रामराज्य" स्थापित कर दे...!
यही कारण है कि.... आज हम देश में बहुसंख्यक होते हुए भी... कभी कश्मीर तो कभी कैराना और कभी मेरठ तक से पलायन को मजबूर हैं.
और... पलायन और मार-काट तो जाने ही दें...
हम "उनसे".... संख्या में, पैसे में , पद में और रेपुटेशन में कोसों आगे होने के बाद भी ... अपना नैरेटिव तक सेट नहीं कर पाते हैं.
हमारी स्थिति तो इतनी दयनीय है कि.... हम अपने मुद्दों को एजेंडा तक नहीं बना पाते हैं...!
जबकि, वे हरामी.... एक बाइक चोर तबरेजवा और गौ तस्कर "पहलू खान" तक के मौत पर तूफान मचा देते हैं और देश के प्रधानमंत्री तक से निंदा करवा लेते हैं...!
पहलू खान से याद आया कि.... पहलू खान के केस में चार्जशीट फाइल हो गई है और पुलिस जांच के हिसाब से .... वो घोंसडीवाला गौ-तस्कर ही था... जो कि अवैध है.
कहने का मतलब ये है कि.... वे हमारी तुलना में मुट्ठीभर हैं... भूखे-नंगे हैं...
फिर भी.... गलत होने के बावजूद ... देश में नैरेटिव सेट करके तूफान मचा देते हैं...!
और.... बेवकूफों की तरह मिमयाते हुए सफाई देते रह जाते हैं...!
ध्यान रखें कि.... अभी वे आपकी तुलना में काफी कम हैं... फिर भी , आपको डिफेंसिव किये हुए हैं.
जिस दिन वे आपके बराबर या ज्यादा हो गए तो.... आपके घर में घुस कर मारेंगे...!
और.... हम.... ?????
हम वही करेंगे जो आजतक करते आये हैं....
आज तक बहाना करते हैं कि.... भाई , वे अल्पसंख्यक कार्ड खेलते हैं... तो, हम क्या करें...!
उस समय बोलेंगे कि.... भाई , हम तो अल्पसंख्यक हैं ना , हम बहुसंख्यको से कैसे लड़ पाएँगे ???
इसीलिए.... अगर अपना अस्तित्व बचाना है तो लड़ना सीखें....
और.... एक बात हमेशा याद रखें कि... युद्ध में सही और गलत करके कुछ नहीं होता है.
युद्ध का अंतिम लक्ष्य है ... "विजय प्राप्ति."
और.... जो जीतता है... वे हमेशा सही ठहराया जाता है और हारे हुए पक्ष को दोषी ठहराया जाता है.
"Man of the match" का खिताब और अगले मैच में जाने मौका हमेशा विजेता टीम को हो दिया जाता है.... हारे हुए टीम को नहीं.
इसीलिए... विजेता बनें... और, इतिहास अपने हिसाब से लिखें...!
क्योंकि.... कहने को तो ये शहर है.... लेकिन, यहाँ जंगल का कानून चलता है...!!
जय महाकाल...!!!
नोट : हम तो एक दो-दंगे से ही घबड़ा कर पाकिस्तान और कैराना वगैरह से भाग गए... लेकिन, हजारों दंगों के बाद भी एक भी मुसरमान हिंदुस्तान छोड़कर नहीं भागा बल्कि उन्होंने खुद को दंगों के लिए तैयार कर लिया.
अब हालात ये है कि....हम बहुसंख्यक होते हुए भी उनके इलाके में जाने से घबड़ाते हैं.. और, हर राजनीतिक पार्टियाँ उन्हें खुश रखने में ही अपनी भलाई समझती है.
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#Meruth
#Kas