विद्यालय पर निबंध

विद्यालय पर निबंध
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"ये क्या लिख दिया बे ?"

मंगरुआ सहमा हुआ, एक कोना  में देवाल से चिपका जा रहा था, और फुलेसर मास्टर एक हाथ मे डंडा तो दूसरे हाथ मे मंगरुआ की काँपी लेकर उसकी ओर बढ़े आ रहे थे।

मास्टर साहेब फिर चिचियाये - अबे बोलता काहे नहीं है?
क्या एहि पढ़ाए थे हम्म ?

मंगरुआ हिम्मत करके कहा - लेकिन माट साब आप स्कूल के जो लच्छण बताये थे, वो मुझे कभी नहीं दिखे ,
इसलिए जो दिखा ओही लिख दिया ।

का दिखा बे हरिश्चंदर की औलाद ?
जो दिखेगा वही लिख देगा ?
अब तुम से एगो निबंध लिखाने की खातिर स्कूलवा को मुगल गार्डन बना दें ?

शान्ति प्रिय हेडमास्टर साहब ने शोरगुल सुना तो
मनोहर कहानियां के नवीन संस्करण को कांख में दबाया
और कक्षा में दाखिल होते ही पूछा - ई सब का है माट साब ? काहें शोर मचाये हैं ?

फुलेसर गुरुजी डंडा को मंगरुआ के पेट में कोंचते हुए गरजे -
इसी से पूछिए सर ,
देखिए विद्यालय पर क्या निबंध लिखा है इस बकलोल ने ।

हेड मास्टर साहब ने मंगरुआ की कॉपी पर नजर दौड़ाई ,
लिखा था ....

मेरा विद्यालय गांव के बाहर मुर्गीबाड़े के बगल में स्थित है । मुर्गियों की बदबू से जीना हराम हो गया है ।
तीन फाटक पहले से गायब थे, और चौथा हेड माट साहेब खुद ठेला पर  लदवा अपने घर ले गये ,
जाड़ा और गर्मी में तो ज्यादा दिक्कत नहीं होता है,
लेकिन बरसात में  क्लास के अंदर भी बरसाती ओढ़ के बईठना पड़ता है ।
अब तो कुत्तों के साथ साथ सियार भी आते जाते रहते हैं । एक बिजली वाला पंखा बिगड़ा तो हेड माट साहेब सारे पंखे खुलवा ले गए बनवाने के लिए , तबसे दु बरिस हो गया आज तक पंखे नहीं आये .....

आगे और भी था, लेकिन पढ़ने की बजाय हेड माट साहेब  ने मुखलाल माट साब के हाथ से छड़ी ले ली और गरजते हुए बोले - रे झुट्ठा कहीं का !  दरवाजे और पंखों का बिल मेरे नाम से फाड़ने से पहले सच्चाई पता किया तूने ?

मंगरुआ डरते हुए बोला - हमको क्या पता था गुरुजी? ऊ तो फुलेसर माट साहेब आपके पीठ पीछे हम लोगों को बताया करते हैं ।

हेड माट साहेब ने मनोहर कहानियां और छड़ी फेंक दी , बगलें झांकते फुलेसर सर को घूरा - का माट साब !
खाली आधा अधूरा ज्ञान देते हैं ? ई काहें नहीं बताये कि ढोलक , हरमुनिया और झाल इस स्कूल से कहाँ लपत्ता हुआ ?
जिस बाल्टी में आपकी भैंसिया दुहाती है ऊ आपने कब खरीदी थी ?
हैण्डपम्प का मुंडी कइसे गायब हुआ था ?

फुलेसर सरजी भी गरजे - बस माट साब बस !
अब एक चुप हजार चुप हो जाइए ,
वरना मिड डे मील से लेकर स्कूल ड्रेस तक की आपकी सारी ईमानदारी यहीं झार देंगे ।

हेड मास्साब ललकारे - अरे चुप चोट्टा कहीं का !
पढ़ाने लिखाने का शऊर नहीं... आया है
मुझपे कीचड़ उछालने का ज्यादा मन कर रहा है तो यहीं उठा के पटक देंगे।

फुलेसर माटसाब ज्यादा जोशीले निकले , 
खुद ही आगे बढे और भीमकाय हेड मास्साब को धक्का देकर धराशाई कर दिए ,
दोनों में गुत्थमगुत्थी चल ही रही थी ,
कि मिड डे मील कर्मी ने आकर  पूछा -

ऐ हेड मास्सायेब ! आज खाना मीनू के हिसाब से बनेगा कि खिचड़ी चढ़ा दें ?.....
साभार

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