राष्ट्रपिता / सिर्फ गांधी
राष्ट्रपिता / सिर्फ गांधी हे गांधी मुझको माफ करो, मै झूठ नहीं लिख पाउँगा। राष्ट्रपिता कहने से पहले, अपनी नजरों में गिर जाऊँगा।। माना आजादी के हवनकुंड में, तुमने भी था हव्य चढ़ाया। लाठी खायी जेल गए थे, सत्याग्रह उपवास कराया।। छलछंद खेल कर किसने, सुभाष का निष्कासन करवाया था? तुम नेहरू से नेह कर रहे, हमने योद्धा वीर गंवाया था।। भगत सिंह से क्रांतिपुत्र, क्यों तुमको बागी लगते थे? झूल गये फांसी के फंदे, क्यों तुमको दागी लगते थे?? जलियांवाला बाग़ की ज्वाला, समझा तुमने फ़ाग था जी। लगता है कि मन मंदिर में, बैठा जहरीला नाग था जी? भारत माता के टुकड़े तुमने, नेहरू हेतु करा डाला। और बहा घड़ियाली आँसू, सांपो को यहाँ बसा पाला।। भगवा तुम्हे खटकता था, और हरा हो गया प्यारा जी। बकरी बनी तुम्हारी माता, गाय विदेशी चारा जी।। पय पान कराती गाय यहाँ, बूचड़खाने में कट जाती है। गांधी तेरी अहिंसा आखिर, किस कोने में मर जाती है।। है आ गया जन्म दिन दोबारा, झूठे ढोल ढपोल बजेंगे। तकली से तलवार हराने के, कायर गीदड़ शोर मचेंगे।। चतुर गीदड़ों की कायरता, अहिंसा का झूठा मंत्र बनी। गीता के मंत्र पढ़े ...