रिश्ता

रिश्ता 

प्रेम में डूबे पुरुष थोड़ा सुलझकर सिमट जाते हैं।
प्रेम में डूबी स्त्री खोल देती है
अपनी सारी गिरहें। स्त्री कैलेण्डर समेट लेती है
सारी मुलाक़ातें अधूरी-पूरी बातें, 
पहला स्पर्श , चुंबन और आलिंगन, 
धड़कनों की रफ़्तार सांसों का स्पंदन।
पुरुष को याद रहता है सिर्फ़ वो नाम और उसकी अधरों पर
मचलकर खिलती मुस्कान। पुरुष अपने अधूरे अरमान तकियों को सुनाते हैं दीवारों को देखकर मुस्कुराते हैं गर्म चाय ठंडी पी जाते हैं।
स्त्री करती है चांद से बातें देखती है इंद्रधनुषी सपने उंगलियों से लिखती है ख़त आसमान पर।
स्त्री प्रेम में निखर जाती है जैसे सूरज की लालिमा छनकर आ गयी हो उसके कपोलों पर।
पुरुष घंटों गुज़ार देते हैं आईने के सामने समझते हुए चेहरे की रोशनी का गणित।दस बार तह करते हैं वही कपड़े ख़्याल रखते हैं सिलवटों का।
स्त्री का कमरा हो जाता है मीना बाज़ार अब वो ठीक करती है सिर्फ़ वही सिलवटें जिन्हें वह चूमकर मिटा सके पुरुष के माथे से।

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