जीवन यथार्थ
जीवन यथार्थ
चलो मन जाये घर अपने...!
सारे पराये हैं कौन है अपने.....!!
इन दो पंक्तियों में जीवन का सम्पूर्ण घटनाक्रम परिभाषित है और इस घटनाक्रम को अगर जानना है, तो जो घटित घटनाक्रम है, उस घटित हुई घटनाक्रम का अवलोकन करना होगा और जब अवलोकन करने पर घटनाक्रम का परिणाम जो सामने आएगा, वह बड़ा आश्चर्य कर देना वाला होगा।
हमारी सारी इच्छाये पराई है, बिना हित की है और इन इच्छाओ ने सदैव तुम्हे भृम जालों में उलझाया है और इस भृम से जो भेद उत्पन्न हुए है तेरे मेरे के, इस से जीवन की दशा व दिशा दोनों ही वास्तविक घर के विपरीत दिशा में चल पड़ी है।
अब इस इच्छा को भी गहराई से समझ लेना, इच्छाओं के अस्तित्व को भी अच्छे से जान लेना, यह इच्छाएं जो जन्म लेती है, यह झूठे अंहकार की तृप्ति के आधार पर जन्म लेती है, दुसरो को प्रभावित करने के लिए जन्म लेती है, स्वयं को स्वयं के रचे माया जाल में उलझाने के लिए जन्म लेती है और फिर कुछ समय के पश्चात तुम्हे छोड़कर विदा हो जाती है और फिर दूसरे रूप में प्रकट हो जाती है।
आपके जो इस मानव परिवेश में जो रिश्ते है, यह भी सारी इच्छाओं के आधार पर ही तो खड़े होते है और जब यह इच्छाएं टूटती बिगड़ती है तो इससे जो भाव प्रकट होते है, वह भाव वैरागी भाव प्रकट होते है, जो प्रश्न खड़े होते है, बड़े आत्म ज्ञान वाले खड़े होते है, की कौन है यहाँ अपना और जब यह प्रश्न खड़ा हो तो इसे समंझ लेना, यह जो इच्छाएं है यह तुम्हारी नही है, अधोपतन की है, भृमित दिशा की और ले जाने वाली है, पराई है यह इच्छाएं और यह इच्छाएं ही सारा भेद खड़ा करती है और जो इन इच्छाओं को सहारा दिए हुए है, यह मन इसे भी जान लेना, क्योंकि मन बड़ा चंचल है और इन इच्छाओं का चंचल बनाने में यह मन का ही कार्य है, इस लिए तो मन सत्य से भागता है, घबराता है, सत्य स्वीकार नही कर पाता है, बौखलाहट पैदा करता है, असुरक्षित महसूस करवाता है और जब इस स्तिथि में मन थकने लगता है, हारने की अवस्था मे आ जाता है, तब उसे घर की याद आती है, उस परमसत्य, उस परमसत्ता की याद आती, की अब घर भी जाना है और उस घर जाना है, जहां से फिर कही और जाने की आवश्यकता न हो, भटकने की आवश्यकता न हों।
जीवन की इस बहती धारा के मध्य फिर यह समझ आजाता है कि, यहाँ इस संसार में जो भटक रहे है, यह जगह, यह निवास सब असत्य है, सत्य तो और कुछ ही है, जिसे अब तक जाना ही नही और जो जानने का अंहकार जन्मा था, वह भी भृम मात्र है और जहाँ पहुंचे, वह भी जहां से यात्रा शुरू की थी, वही की वही पर है, न कही पहुंचे ओर न यात्रा पूरी हुई।
अब ऐसे में जीवन मे जब ऐसी स्तिथि प्रकट होती है, उत्पन्न होती है, तब घर की याद आती है, फिर मन भागता है घर की तरफ, दौड़ता है फिर और इस दौड़ में फिर न कोई इच्छा रहती है, न कोई भेद एक अलग ही घर जाने की इस दिशा में धीरे धीरे सारी तृप्ति महसूस होने लगती है, जो होड़ दौड़ थी, जब छूट जाती है, वह सारी इच्छाएं, सारे वह भाव नफरत, हिंसा व ईष्या जो जीवन को नरक बनाये हुए थे, सब अब विलीन हो जाते है और उस नई दिशा में जो बोध उठता है, वह बोध आत्मबोधता व वास्तविक उस परमसत्ता जहां से तुम्हे ऊर्जा मिल रही है, उस दिशा में बढ़ने लगते है, फिर सारा भय, सारी चिंताएं, सारे अवसाद समाप्त हो जाते है और जो भाव उत्पन्न होते है इस राह पर वह भाव प्रेम, करुणा, दया व असीम आनन्द जीवन मे आ जाते है।
यही से जीवन पूर्ण परिपक्वता की और बढ़ने लगता है और जीवन को पूर्ण परिपक्वता में अनुभव कर लेना ही मानव जीवन का मूल उद्देश्य है।
लेखक - आचार्य श्री रवि जी