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अनजान रिश्ता

अनजान रिश्ता ट्रैन के ए.सी. कम्पार्टमेंट में मेरे सामने की सीट पर बैठी लड़की ने मुझसे पूछा " हैलो, क्या आपके पास इस मोबाइल की पिन है??" उसने अपने बैग से एक फोन निकाला था, और नया सिम कार्ड उसमें डालना चाहती थी। लेकिन सिम स्लॉट खोलने के लिए पिन की जरूरत पड़ती है जो उसके पास नहीं थी। मैंने हाँ में गर्दन हिलाई और सीट के नीचे से अपना बैग निकालकर उसके टूल बॉक्स से पिन ढूंढकर लड़की को दे दी। लड़की ने थैंक्स कहते हुए पिन ले ली और सिम डालकर पिन मुझे वापिस कर दी। थोड़ी देर बाद वो फिर से इधर उधर ताकने लगी, मुझसे रहा नहीं गया.. मैंने पूछ लिया "कोई परेशानी??" वो बोली सिम स्टार्ट नहीं हो रही है, मैंने मोबाइल मांगा, उसने दिया। मैंने उसे कहा कि सिम अभी एक्टिवेट नहीं हुई है, थोड़ी देर में हो जाएगी। और एक्टिव होने के बाद आईडी वेरिफिकेशन होगा उसके बाद आप इसे इस्तेमाल कर सकेंगी। लड़की ने पूछा, आईडी वेरिफिकेशन क्यों?? मैंने कहा " आजकल सिम वेरिफिकेशन के बाद एक्टिव होती है, जिस नाम से ये सिम उठाई गई है उसका ब्यौरा पूछा जाएगा बता देना" लड़की बुदबुदाई "ओह्ह " म...

पलायन

पलायन 1990 के दशक में अमिताभ की एक फ़िल्म आई थी.... ""अग्निपथ"". उस समय तो नहीं... लेकिन, अभी हाल-फिलहाल में मुझे वो फ़िल्म टीवी पर देखने का मौका लगा.. उस फिल्म में अमिताभ एक डायलॉग बोलते हैं.... "सिर्फ, कहने को ये शहर है गायतोंडे साहब , लेकिन यहाँ आज भी जंगल का कानून चलता है. यहाँ, हर ताकतवर ... कमजोर को मार कर जीता है. चींटी को बिस्तुइया खा जाती है और बिस्तुइया को मेंढक खा है. मेंढक को सांप निंगल जाता है और सांप को नेवला फाड़ देता है. भेड़िया, नेवले का खून चूस लेता है और शेर भेड़िए को चबा जाता है. यहाँ... हर कोई अपने से कमजोर को मार कर जीता है. हालांकि.... ये कहने को तो सिर्फ एक फ़िल्म का डायलॉग है लेकिन.... हमारे समाज की यही अघोषित सच्चाई है.... पहले हम हिन्दू ... अफगानिस्तान से भागे और कारण बताया कि वहाँ मुसलमान बहुसंख्यक हो गए हैं और हमें चैन से जीने नहीं दे रहे हैं. उसके बाद 1947 में पाकिस्तान और बांग्लादेश से भागे...! तदुपरांत... कश्मीर, असम, कैराना और अब मेरठ...! पलायन का जगह बेशक हर समय अलग-अलग रहा लेकिन कारण हमेशा एक रहा कि......

लाडली

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------ #लाडली ----- शोकेस में रखी माँ की तस्वीर के साथ अब पिताजी की तस्वीर भी रख दी गई थी, उस पर भी फूल माला चढी हुई और सामने अगरबत्ती जल रही थी। कनिका सामने अपने बेड पर बैठी एकटक पिताजी के उस चित्र को देख रही थी। पिछले बीस दिनों में मानो उसकी ज़िन्दगी का चक्र ही स्थिर हो गया था, कई वर्ष पहले माँ के स्वर्गवास के बाद से ही पिताजी ने उसकी तथा भैया कपिल की पूरी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली थी। दोनों की सारी आवश्यकताएं ऑफिस जाने के साथ यथासमय पूरी करना ही उनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य हो गया था। कपिल तो लड़का था पर कनिका को भी कभी माँ की कमी महसूस नहीं होने दी पिताजी ने। कनिका यूँ तो हर तरह से सुखी संतुष्ट थी परन्तु कपिल का व्यवहार अक्सर उसे उदास कर देता था, हर बात में वह स्वयं को कनिका से श्रेष्ठ मानता था, अपने से 2 साल बड़े भाई से जैसे दोस्ताना व्यवहार की अपेक्षा किसी भी बहन को हो सकती थी वैसा कनिका को कपिल से कभी नहीं मिलता था। एक दिन तो तब हद ही हो गईं थी जब किसी बात पर होने वाली बहस बढ़ते बढ़ते शिकायत के रूप में पिताजी तक पहुँच गई, जब उन्होंने दोनों को समझाया तो कनिका तुरंत मान गई पर कप...

“सॉरी, रांग नम्बर”

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“हैलो...हैलो...अंकित बेटा...हम पहुँचने वाले हैं...ट्रेन आउटर पर खड़ी है।” “अच्छा पापा, मैं भी निकलता हूँ ऑफिस से, बस दस मिनट में स्टेशन पहुँच जाऊँगा। आप वेटिंग रूम में बैठ जाइएगा” कहकर अंकित ने फोन काट दिया। उधर ट्रेन में बैठे राजेन्द्र जी और उनकी पत्नी उर्मिला ने भी बड़े उत्साह से अपना बैग-अटैची सँभाल ली क्योंकि दिल्ली का स्टेशन आने वाला ही था। गाड़ी भी रेंगने लगी थी। उर्मिला ने बहुत गद्गद् होते हुए कहा, “पता ही नहीं चला कि पाँच साल कैसे बीत गये? लड्डू भी तो अब बोलने लगा है।” राजेन्द्र जी भी मुस्कुराकर बोले, “हाँ...अगर उसने फोन पर नहीं कहा होता कि ‘दादा दी तब आओदे’ ...तो मैं आता नहीं। पाँच साल में एकबार भी नहीं बुलाया अंकित और सलोनी ने।” “ओफ्फो! आप तो हर समय झुँझलाते ही रहते हैं। अरे बच्चे अपने काम में बिजी थे कि हमारी देखभाल करते। दोनों को ऑफिस जाना होता है। खाली घर में क्या करते हम? ठीक है, अब बुला लिया ना?” उर्मिला ने समझाते हुए कहा, “अच्छा सुनिए, उनके फंक्शन में कुछ भी हो ज्यादा टेंशन मत करना...दिल्ली का सिस्टम अलग है।” “हाँ-हाँ जानता हूँ...चलो प्लेटफार्म आ गया”...

आरक्षण

 हमें आरक्षण से कोई आपत्ति नहीं है !           समस्या तो यह है कि ~ जिसको आरक्षण दिया जा रहा है , वो सामान्य आदमी बन ही नहीं पा रहा है !         समय सीमा तय हो कि ~          वह सामान्य नागरिक           कब तक बन जायेगा ? किसी व्यक्ति को आरक्षण दिया गया और वो किसी सरकारी नौकरी में आ गया ! अब उसका वेतन ₹5500 से ₹50000 व इससे भी अधिक है , पर जब उसकी संतान हुई तो वह भी पिछडी ही पैदा हुई ,           और ... हो गई शुरुआत ! उसका जन्म हुआ प्राईवेट अस्पताल में ~   पालन पोषण हुआ राजसी माहोल में ~       फिर भी वह गरीब पिछड़ा और     सवर्णों के अत्याचार का मारा  हुआ ? उसका पिता लाखों रूपए सालाना कमा   रहा है , तथा उच्च पद पर आसीन है !     सारी सरकारी सुविधाएं  ले रहा है !            वो खुद जिले के ...  सबसे अच्छे स्कूल में पढ़ रहा है , और    सरकार ... उसे...

संगिनी

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पति पत्नी के बीच प्रेम क्या होता है कोई  विजेंद्र सिंह राठौड़ से सीखे ! यह तस्वीर अजेमर के निवासी विजेंद्र सिंह राठौड़ और उनकी धर्मपत्नी लीला की है। 2013 में लीला ने विजेंद्र से आग्रह किया के वह चार धाम की यात्रा करना चाहती हैं। विजेंद्र एक ट्रेवल एजेंसी में कार्यरत थे। इसी दरमियां ट्रैवेल एजेंसी का एक टूर केदारनाथ यात्रा जाने के लिये निश्चित हुआ। पतिपत्नी ने अपना बोरिया बिस्तर बांधा और केदारनाथ जा पहुंचे। विजेंद्र और लीला एक लॉज में रुके थे। लीला को लॉज में छोड़ विजेंद्र कुछ दूर ही गये थे के चारों ओर हाहाकार मच गई। उत्तराखंड में आई भीषण बाढ़ का उफनता पानी केदारनाथ आ पहुंचा था। विजेंद्र ने बामुश्किल अपनी जान बचाई। मौत का तांडव और उफनते हुये पानी का वेग शांत हुआ तो विजेंद्र बदहवास होकर उस लॉज की ओर दौड़े जहाँ वह लीला को छोड़ कर आये थे। परन्तु वहाँ पहुंच कर जो नज़ारा दिखा वह दिल दहला देने वाला था। सब कुछ बह चुका था। प्रकृति के इस तांडव के आगे वहां मौजूद हर इंसान बेबस दिख रहा था। तो क्या लीला भी ..... नहीं नहीं। ऐसा नहीं हो सकता।विजेंद्र ने अपने मन को समझाया। "वह जीवित है" विजे...

प्रभू का पत्र

प्रभू का पत्र मेरे प्रिय... सुबह तुम जैसे ही सो कर उठे, मैं तुम्हारे बिस्तर के पास ही खड़ा था। मुझे लगा कि तुम मुझसे कुछ बात करोगे। तुम कल या पिछले हफ्ते हुई किसी बात या घटना के लिये मुझे धन्यवाद कहोगे। लेकिन तुम फटाफट चाय पी कर तैयार होने चले गए और मेरी तरफ देखा भी नहीं!!! फिर मैंने सोचा कि तुम नहा के मुझे याद करोगे। पर तुम इस उधेड़बुन में लग गये कि तुम्हे आज कौन से कपड़े पहनने है!!! फिर जब तुम जल्दी से नाश्ता कर रहे थे और अपने ऑफिस के कागज़ इक्कठे करने के लिये घर में इधर से उधर दौड़ रहे थे... तो भी मुझे लगा कि शायद अब तुम्हे मेरा ध्यान आयेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। फिर जब तुमने आफिस जाने के लिए ट्रेन पकड़ी तो मैं समझा कि इस खाली समय का उपयोग तुम मुझसे बातचीत करने में करोगे पर तुमने थोड़ी देर पेपर पढ़ा और फिर खेलने लग गए अपने मोबाइल में और मैं खड़ा का खड़ा ही रह गया। मैं तुम्हें बताना चाहता था कि दिन का कुछ हिस्सा मेरे साथ बिता कर तो देखो, तुम्हारे काम और भी अच्छी तरह से होने लगेंगे, लेकिन तुमनें मुझसे बात ही नहीं ...