संदेश

प्रभू का पत्र

प्रभू का पत्र मेरे प्रिय... सुबह तुम जैसे ही सो कर उठे, मैं तुम्हारे बिस्तर के पास ही खड़ा था। मुझे लगा कि तुम मुझसे कुछ बात करोगे। तुम कल या पिछले हफ्ते हुई किसी बात या घटना के लिये मुझे धन्यवाद कहोगे। लेकिन तुम फटाफट चाय पी कर तैयार होने चले गए और मेरी तरफ देखा भी नहीं!!! फिर मैंने सोचा कि तुम नहा के मुझे याद करोगे। पर तुम इस उधेड़बुन में लग गये कि तुम्हे आज कौन से कपड़े पहनने है!!! फिर जब तुम जल्दी से नाश्ता कर रहे थे और अपने ऑफिस के कागज़ इक्कठे करने के लिये घर में इधर से उधर दौड़ रहे थे... तो भी मुझे लगा कि शायद अब तुम्हे मेरा ध्यान आयेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। फिर जब तुमने आफिस जाने के लिए ट्रेन पकड़ी तो मैं समझा कि इस खाली समय का उपयोग तुम मुझसे बातचीत करने में करोगे पर तुमने थोड़ी देर पेपर पढ़ा और फिर खेलने लग गए अपने मोबाइल में और मैं खड़ा का खड़ा ही रह गया। मैं तुम्हें बताना चाहता था कि दिन का कुछ हिस्सा मेरे साथ बिता कर तो देखो, तुम्हारे काम और भी अच्छी तरह से होने लगेंगे, लेकिन तुमनें मुझसे बात ही नहीं ...

विश्वास

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मेरी बेटी की शादी थी और मैं कुछ दिनों की छुट्टी ले कर शादी के तमाम इंतजाम को देख रहा था. उस दिन सफर से लौट कर मैं घर आया तो पत्नी ने आ कर एक लिफाफा मुझे पकड़ा दिया. लिफाफा अनजाना था लेकिन प्रेषक का नाम देख कर मुझे एक आश्चर्यमिश्रित जिज्ञासा हुई. ‘अमर विश्वास’ एक ऐसा नाम जिसे मिले मुझे वर्षों बीत गए थे. मैं ने लिफाफा खोला तो उस में 1 लाख डालर का चेक और एक चिट्ठी थी. इतनी बड़ी राशि वह भी मेरे नाम पर. मैं ने जल्दी से चिट्ठी खोली और एक सांस में ही सारा पत्र पढ़ डाला. पत्र किसी परी कथा की तरह मुझे अचंभित कर गया. लिखा था : आदरणीय सर, मैं एक छोटी सी भेंट आप को दे रहा हूं. मुझे नहीं लगता कि आप के एहसानों का कर्ज मैं कभी उतार पाऊंगा. ये उपहार मेरी अनदेखी बहन के लिए है. घर पर सभी को मेरा प्रणाम. आप का, अमर. मेरी आंखों में वर्षों पुराने दिन सहसा किसी चलचित्र की तरह तैर गए. एक दिन मैं चंडीगढ़ में टहलते हुए एक किताबों की दुकान पर अपनी मनपसंद पत्रिकाएं उलटपलट रहा था कि मेरी नजर बाहर पुस्तकों के एक छोटे से ढेर के पास खड़े एक लड़के पर पड़ी. वह पुस्तक की दुकान में घुसते हर संभ्रांत व्यक्...

क्या सरकारी नौकरी ही सब कुछ है ?

क्या सरकारी नौकरी ही सब कुछ है ? किसी के यहां जाकर वेतन पर कार्य करने या सेवा देने को नौकरी कहते हैं। नौकरी भी दो प्रकार की हैं-- प्राइवेट नौकरी और सरकारी नौकरी। प्राइवेट नौकरी में जी तोड़ मेहनत कराई जाती है तब कहीं जाकर पगार मिलती है। कहीं तो व्यवस्था ठीक-ठाक है और कहीं-कहीं इसमें भारी गोलमाल होता है। मेहनत ज्यादा कराई जाती है और पगार कम मिलती है। ऐसा भी देखने को मिला है कि वेतन कम देते हैं लेकिन हस्ताक्षर या अंगूठा ज्यादा राशि पर लगाया जाता है। दूसरी ओर सरकारी नौकरी है जहाँ काम के घंटे निश्चित होते हैं और वेतन भी नियमानुसार मिलता है। यदि ऐसा नहीं होता है तो उसकी शिकायत की जा सकती है-- फिर पुलिस और कचहरी तक बात जाती है। अनियमितता पाये जाने पर आरोपी को सजा का प्रावधान भी है। लेकिन प्राइवेट नौकरी में ऐसा कुछ नहीं है। इसलिए लोग प्राइवेट नौकरी के स्थान पर सरकारी नौकरी को ज्यादा वरीयता देते हैं। सरकारी नौकरी के बारे में लोगों के मन में यह धारणा बन गई है कि सरकारी नौकरी का मतलब है हरामगर्दी और और ऊपर से रिश्वतखोरी की अतिरिक्त आमदनी। सब सरकारी नौकरों  पर यह बात लागू नहीं होती लेकिन कु...

एक बिहारी

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जहाँ तेरी ये नज़र है।।।

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विकास पागल हो गया है.

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विकास पागल हो गया है. विकास पागल हो गया है| सचमुच पागल हो गया है. इसके पागल होने की शुरुआत भी गुजरात से ही हुई थी. पहली बार विकास 2002 में पागल हुआ था जब गोधरा में निहत्थे कारसेवकों को ट्रेन में ज़िंदा ही जला दिया गया था. तब पहली बार विकास ने अपने पागलपन का एहसास कराया था. बरसों बरस दंगों की आग में झुलसते रहे गुजरात ने विकास के इस पागलपन के बाद कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और न ही दुबारा कभी गुजरात में दंगा हुआ. पहले विकास की बड़ी बुरी हालत थी. तब विकास बहुत ज़्यादा बिगड़ैल था. लुटियंस ज़ोन में कुछ दलालों के साथ ही ज़्यादा बैठता था. शराब, शबाब और क़बाब में ही डूबा रहता था. केवल कुछ नेताओं और दलाल पत्रकारों, अधिकारियों, कर्मचारियों, ठेकेदारों, उद्योगपतियों का ही विकास करता था. उन्हीं की महफ़िलों में ठुमके लगाता, झूमता गाता, उन्हीं के बिस्तरों में सोता था. विकास कब कहाँ किसके साथ जायेगा, ये मुट्ठीभर लोग ही तय करते थे. देश की जनता त्राहिमाम त्राहिमाम करती, लेकिन विकास कुछ लोगों के साथ जमकर रंगरेलियां मनाता था. कश्मीर में जमकर पत्थरबाज़ी होती, सेना पर हमले किये जाते, सेना के जवान शहीद होते, घ...

Pulwama Attack

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