क्या सरकारी नौकरी ही सब कुछ है ?

क्या सरकारी नौकरी ही सब कुछ है ?


किसी के यहां जाकर वेतन पर कार्य करने या सेवा देने को नौकरी कहते हैं। नौकरी भी दो प्रकार की हैं-- प्राइवेट नौकरी और सरकारी नौकरी। प्राइवेट नौकरी में जी तोड़ मेहनत कराई जाती है तब कहीं जाकर पगार मिलती है। कहीं तो व्यवस्था ठीक-ठाक है और कहीं-कहीं इसमें भारी गोलमाल होता है। मेहनत ज्यादा कराई जाती है और पगार कम मिलती है। ऐसा भी देखने को मिला है कि वेतन कम देते हैं लेकिन हस्ताक्षर या अंगूठा ज्यादा राशि पर लगाया जाता है। दूसरी ओर सरकारी नौकरी है जहाँ काम के घंटे निश्चित होते हैं और वेतन भी नियमानुसार मिलता है। यदि ऐसा नहीं होता है तो उसकी शिकायत की जा सकती है-- फिर पुलिस और कचहरी तक बात जाती है। अनियमितता पाये जाने पर आरोपी को सजा का प्रावधान भी है। लेकिन प्राइवेट नौकरी में ऐसा कुछ नहीं है। इसलिए लोग प्राइवेट नौकरी के स्थान पर सरकारी नौकरी को ज्यादा वरीयता देते हैं। सरकारी नौकरी के बारे में लोगों के मन में यह धारणा बन गई है कि सरकारी नौकरी का मतलब है हरामगर्दी और और ऊपर से रिश्वतखोरी की अतिरिक्त आमदनी। सब सरकारी नौकरों  पर यह बात लागू नहीं होती लेकिन कुछ  ऐसे लोगों के दुष्कर्मों से अच्छे लोग भी बदनाम हो रहे हैं। लोग अपनी कन्याओं के विवाह सरकारी नौकरों के साथ करना पसंद करते हैं और प्राइवेट नौकरों को अनदेखा करते हैं। इस प्रवृत्ति से अब सारा समाज पीड़ित है।
                      मज़े की बात यह है कि सरकारी नौकरी भी सभी को नहीं मिल सकती । इसके कई कारण हैं। सरकार पर इतना बजट नहीं है कि सभी को नौकरी दे सके। संसाधनों की भी कमी है। जब से डिजिटल इंडिया का कार्यक्रम चला है तो बेरोजगारी की समस्या बढ़ी है क्योंकि आदमी का काम मशीनों और कम्प्यूटरों से होने लगा है। जिस एक काम के लिए सैंकड़ों या हज़ारों या लाखों लोग करते थे उसको कुछ मशीनों और कम्प्यूटरों से निपटाया जा रहा है। उदाहरण के लिए बैंकिंग प्रणाली है। पहले धनराशि को निकालने या जमा करने के लिए लम्बी-लम्बी लाइनें देखने को मिलती थीं लेकिन अब सब कुछ ऑन लाइन हो रहा है और वह भी हर पल।
हमारे देश में दो सेक्टर काम कर रहे हैं--- पब्लिक सेक्टर और प्राइवेट सेक्टर। पब्लिक सेक्टर का दायरा सीमित है जबकि प्राइवेट सेक्टर अत्यधिक विस्तृत है। प्राइवेट सेक्टर में भी अच्छे जॉब हैं। वहाँ योग्य व्यक्तियों को सरकारी नौकरों से ज्यादा वेतन मिल रहा है और ज्यादा सुविधाएं भी। उनको निश्चित टारगेट दिया जाता है जिसे निश्चित समय में पूरा करना पड़ता है। टारगेट पूरा होने पर वेतनवृद्धि भी होती है। सरकार प्राइवेट सेक्टर को ज्यादा मजबूत करने पर लगी हुई है क्योंकि सरकारी सेक्टर में सभी को रोज़गार देना सरकार के बूते की बात नहीं है। जनता को इस सच्चाई को स्वीकार करना चाहिए। जनता को यह भी स्वीकार करना चाहिए कि सरकारी नौकरी मटरगश्ती करने या रिश्वतखोरी के लिए नहीं है। आज रिश्वत लेना -देना भी आसान काम नहीं है। आज हर आदमी के हाथ में मोबाइल है। पता नहीं कौन कब ऑडियो-वीडियो बना डाले और पल में ही थाने-कचहरी का चक्कर पड़ जाये। आज सरकारी नौकरी करना आसान नहीं है। कदम-कदम पर दुश्मन बैठे हैं। पता नहीं कब नौकरी चली जाये या जेल में जाना पड़ जाये। जब तक आदमी कुर्सी पर है तब तक लोग उसको सलाम ठोकते हैं लेकिन नौकरी जाने पर कोई उस बर्खास्त व्यक्ति के पास नहीं फटकता । "सुख के सब साथी, दुख में ना कोय।"
गुजराती और मारवाड़ी लोग सरकारी नौकरी की बजाय अपना स्वयं का रोजगार चलाना ज्यादा अच्छा मानते हैं भले ही धन्धा छोटा-मोटा हो। मेरा भी यही मानना है कि सरकारी नौकरी के पीछे ज्यादा न भागो, अपने रोजगार पर ध्यान दो , भले ही वह काम चाय बेचना हो या पकोड़े बेचना। सोच में बदलाव लाओ। दिल्ली के एनसीआर क्षेत्र में एक भयंकर प्रवृत्ति देखने को मिल रही है कि पढ़े-लिखे नौजवान अपने खेतों में काम करना नहीं चाहते। वे अपना सब कुछ बेचकर बस नौकरी के पीछे पड़े हुए हैं। हो यह रहा है कि आदमी बड़ी - बड़ी कम्पनियों को अपने खेतों को गिरवी रखकर या बेचकर अपने बच्चों को उनके कॉलेजों में पढ़वाते हैं और फिर उनके बच्चे कम्पनियों के दफ्तरों में मामूली से वेतन पर नौकरी करते हैं। इससे तो यह अच्छा होता कि वे स्वयं का रोजगार विकसित करते।
                   अब इस समय भयंकर बहस छिड़ी हुई है कि मोदी के शासनकाल में रोजगार कम हुआ है। सबके अपने-अपने तर्क हैं। किसको सही कहें और किसको गलत ? यह सही है कि मशीनों और कम्प्यूटरों ने लोगों के रोज़गार को कम किया है लेकिन वहीं अपने रोज़गार को विकसित करने की प्रवृत्ति में वृद्धि हुई है। जहां पहले आयकरदाताओं की संख्या लगभग तीन करोड़ थी लेकिन मोदी के शासनकाल में वह संख्या छ: करोड़ से ज्यादा हो गई है। इसका सीधा अर्थ है कि लोगों ने अपने स्वयं के प्राइवेट कार्य करने शुरू कर दिये हैं।
मैं दिल्ली में गोस्वामियों के सेवार्थ  वर-बधू वैवाहिक केन्द्र चलाता हूँ। लोग मेरे पास संदेश भिजवाते रहते हैं कि --" सर ! मेरी बेटी के लिए सरकारी नौकरी करनेवाला वर दिलवाइये।" मेरा यह कहना है कि सभी कन्याओं के लिए ऐसे वर मिलने सम्भव नहीं हैं। अतः प्राइवेट नौकरी करनेवालों के लिए भी अपने मन और घर के पट खोलिए अन्यथा बच्चे दूसरी बिरादरियों में चले जायेंगे। एक समस्या मैं गोस्वामी समाज में और देख रहा हूँ कि लड़कियां बहुत काबिल निकल गईं हैं जबकि लड़के इस रेस में पिछड़ गये हैं। योग्य वर न मिलने पर लोग दूसरी जातियों के लड़कों की ओर निहार रहे हैं। इस समस्या का समाधान खोजा जाना चाहिए। मेरा यह मानना है कि स्वरोज़गारकर्त्ताओं को भी मान्यता दी जानी चाहिए।

★★ लेखक - गिरिवर गिरि गोस्वामी निर्मोही , नयी दिल्ली, 9818461932 
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