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जिंदगी यूँ चल तो रही है

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बहोत ज्यादा डगमगाते हुए संभल तो रही है ज़िन्दगी यूँ चल तो रही है रास्ते जाने अनजान ही सही बदल तो रही है ज़िन्दगी यूँ चल तो रही है हज़ारों ख्वाहिशें पूरी ना हुई नई पल तो रही है ज़िन्दगी यूँ चल तो रही है दुख है, दर्द है, तकलीफ़े भी है खुशियाँ मचल तो रही है ज़िन्दगी यूँ चल तो रही है मेरे जैसो की कमी नहीं है यहाँ बात ये खल तो रही है ज़िन्दगी यूँ चल तो रही है रोज़ नई सी आश लिए होता हूँ मगर बकवास चल तो रही है ज़िन्दगी यूँ चल तो रही है |

पता नही क्यूँ हूँ!

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यूँ हूँ  क्यूँ हूँ  नहीं पता क्यूँ हूँ  मरा हूँ  खरा हूँ  गले तक भरा हूँ  मन हूँ  तन हूँ  बेपरवाह मगन हूँ  दर्द हूँ  चुभन हूँ  मैं अकेलापन हूँ  यूँ हूँ  क्यूँ हूँ  नहीं पता क्यूँ हूँ

अनुभव

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अनुभव यकायक एक शख्स सीट से उठा और जोर से चिल्लाया..  "ट्रेन रोको" कोई कुछ समझ पाता उसके पूर्व ही उसने ट्रेन की जंजीर खींच दी..ट्रेन रुक गईं..!! ट्रेन का गार्ड दौड़ा-दौड़ा आया। कड़क आवाज में पूछा..  किसने ट्रेन रोकी..?? कोई अंग्रेज बोलता उसके पहले ही, वह शख्स बोल उठा..  "मैंने रोकी श्रीमान".. पागल हो क्या ? पहली बार ट्रेन में बैठे हो ? तुम्हें पता है, बिना कारण ट्रेन रोकना अपराध हैं..गार्ड गुस्से में बोला..!! हाँ श्रीमान ज्ञात है किंतु, मैं ट्रेन न रोकता तो सैकड़ो लोगो की जान चली जाती..!! अब तो जैसे अंग्रेजों का गुस्सा फूट पड़ा। सभी उसको गालियां दे रहे थे..गंवार, जाहिल जितने भी शब्द शब्दकोश मे थे, बौछार कर रहे थे..किंतु वह शख्स गम्भीर मुद्रा में शांत खड़ा था,मानो उस पर किसी की बात का कोई असर न पड़ रहा हो..उसकी चुप्पी अंग्रेजों का गुस्सा और बढा रही थी..!! किस्सा दरअसल आजादी से पहले, ब्रिटेन का है..!!ट्रेन अंग्रेजों से भरी हुई थी। उसी ट्रेन के एक डिब्बे में अंग्रेजों के साथ एक भारतीय भी बैठा हुआ था..!! उस शख्स की बात सुनकर सब जोर-जोर से हंसने लगे। किँतु उसने बिना ...

जीवन यथार्थ

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जीवन यथार्थ चलो मन जाये घर अपने...! सारे पराये हैं कौन है अपने.....!! इन दो पंक्तियों में जीवन का सम्पूर्ण घटनाक्रम परिभाषित है और इस घटनाक्रम को अगर जानना है, तो जो घटित घटनाक्रम है, उस घटित हुई घटनाक्रम का अवलोकन करना होगा और जब अवलोकन करने पर घटनाक्रम का परिणाम जो सामने आएगा, वह बड़ा आश्चर्य कर देना वाला होगा।  हमारी सारी इच्छाये पराई है, बिना हित की है और इन इच्छाओ ने सदैव तुम्हे भृम जालों में उलझाया है और इस भृम से जो भेद उत्पन्न हुए है तेरे मेरे के, इस से जीवन की दशा व दिशा दोनों ही वास्तविक घर के विपरीत दिशा में चल पड़ी है।  अब इस इच्छा को भी गहराई से समझ लेना, इच्छाओं के अस्तित्व को भी अच्छे से जान लेना, यह इच्छाएं जो जन्म लेती है, यह झूठे अंहकार की तृप्ति के आधार पर जन्म लेती है, दुसरो को प्रभावित करने के लिए जन्म लेती है, स्वयं को स्वयं के रचे माया जाल में उलझाने के लिए जन्म लेती है और फिर कुछ समय के पश्चात तुम्हे छोड़कर विदा हो जाती है और फिर दूसरे रूप में प्रकट हो जाती है।  आपके जो इस मानव परिवेश में जो रिश्ते है, यह भी सारी इच्छाओं के आधार पर ही तो ख...

प्रसाद - भगवान को भोग लगाना

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ॐ श्री गुरुवे नमः। ॐ नमः शिवाय क्या भगवान हमारे द्वारा चढाया गया भोग खाते हैं? यदि खाते हैं तो वह वस्तु खत्म क्यों नहीं हो गई? एक लड़के ने अपने गुरु से ऐसा प्रश्न किया। गुरु ने कुछ समाधान नहीं दिया। पाठ पढ़ाते रहे। उस दिन पाठ में एक श्लोक सिखाया। पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥ पाठ पूरा होने पर सभी को कहा कि पुस्तक देखकर श्लोक कंठस्थ करलें।  थोड़ी देर बाद प्रश्न करने वाले शिष्य के पास जाकर पूछा कि श्लोक कंठस्थ हुआ कि नहीं। तब उस शिष्य ने पूरा श्लोक सही सही सुना दिया। फिर भी गुरु ने सर नहीं में हिलाया। तो शिष्य ने कहा कि- “चाहे तो पुस्तक देख लें। श्लोक सही है।” तो गुरु ने कहा-“अरे श्लोक तो पुस्तक में ही है। तो तुम्हें कैसे आ गया?” तो शिष्य कुछ कह नहीं पाया।  गुरु  ने कहा- “पुस्तक में जो श्लोक है वह स्थूल स्थिति में है। तुम ने जब पढ़ा तो वह सूक्ष्म स्थिति में अंदर प्रवेश कर गया। उसी स्थिति में तुम्हारा मन रहता है। इतना ही नहीं, तुम जब इसको पढ़कर कंठस्थ करते हो, तो पुस्तक में जो स्थूल स्थिति का श्लोक है उसमें कोई ...