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बेटी की चाह
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बेटी की चाह . 40-42 साल की परिपक्व घरेलू स्त्री थी सुधा. भरापूरा परिवार था. धन-धान्य की कोई कमी नहीं थी. सुधा भी ख़ुश ही थी अपने घर-संसार में, लेकिन कभी-कभी अचानक बेचैन हो उठती. इसका कारण वह ख़ुद भी नहीं जानती थी. पति उससे हमेशा पूछते कि उसे क्या परेशानी है? पर वह इस बात का कोई उत्तर न दे पाती. तीनों ही बच्चे बड़े हो गए थे. सबसे बड़ा बेटा इंजीनियरिंग के तीसरे वर्ष में, मंझला पहले वर्ष में और छोटा दसवीं में था. तीनों ही किशोरावस्था में थे. अब उनके रुचि के विषय अपने पिता के विचारों से ज़्यादा मेल खाते. वे ज़्यादातर समय अपने पिता, टीवी और दोस्तों के साथ बिताते. सुधा चाहती थी कि उसके तीनों बेटे उसके साथ कुछ समय बिताएं, पर उनकी रुचियां कुछ अलग थीं. अब वे तीनों ही बच्चे नहीं रह गए थे, धीरे-धीरे वे पुरुष बनते जा रहे थे. एक सुबह सुधा ने अपने पति से कहा, “मेरी ख़ुशी के लिए आप कुछ करेंगे?” पति ने कहा, “हां-हां क्यों नहीं? तुम कहो तो सही.” सुधा सहमते हुए बोली, “मैं एक बेटी गोद लेना चाहती हूं.” पति को आश्चर्य हुआ, पर सुधा ने कहा, “सवाल-जवाब मत करिएगा, प्लीज़.” तीनों बच्चों के सामने भी यह प्रस्ताव रख...
बंगाल सत्ता का रक्त चरित्र
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आप तृणमूल के नही है तो सावधान बंगाल में आप सुरक्षित नही ?? #बंगाल_सत्ता_का_रक्त_चरित्र अमित शाह के हेलीकॉप्टर की एंट्री..."No" योगी के हेलीकॉप्टर की एंट्री..."No" CBI की एंट्री...."No" लोकतंत्र है या तालिबानी तंत्र...??? बांग्लादेशी और रोहिंग्याओ घुसपैठियों का दिल से स्वागत हैं।। ऐसी भी क्या मजबूरी थी की मुख्यमंत्री को स्वयं, भ्रष्टाचार के आरोपी को बचाने के लिए, उसके घर दौड़ कर आना पड़ा ? ये रिश्ता क्या कहलाता है ?? कोलकता की घटना पर कुछ तथ्य,कुछ निष्कर्ष:- 1.सीबीआई केंद्र सरकार के निर्देश पर नहीं बल्कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर शारदा चिटफंड घोटाले की जाँच कर रही है। 2.सीबीआई के बार-बार सम्मन दिए जाने के बावजूद पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार उपस्थित नहीं हो रहे थे सीबीआई उन्हें चार बार सम्मन दे चुकी थी। 3.सीबीआई पुलिस कमिश्नर से शारदा चिटफंड घोटाले पर केवल पूछताछ करने गई थी,गिरफ्तार करने नहीं। निष्कर्ष:- 1.आप किसी सरकारी अधिकारी को ड्यूटी करने से कैसे रोक सकते हैं? 2.एक मुख्यमंत्री भ्र्ष्टाचार में संलिप्त किसी अधिकारी को बचाने के लि...
सकारात्मक सोच
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सकारात्मक सोच एक घर के पास काफी दिन से एक बड़ी इमारत का काम चल रहा था। वहां रोज मजदूरों के छोटे-छोटे बच्चे एक दूसरे की शर्ट पकडकर रेल-रेल का खेल खेलते थे। रोज कोई बच्चा इंजिन बनता और बाकी बच्चे डिब्बे बनते थे...इंजिन और डिब्बे वाले बच्चे रोज बदल जाते,पर...केवल चड्डी पहना एक छोटा बच्चा हाथ में रखा कपड़ा घुमाते हुए रोज गार्ड बनता था। पास के बगीचे में शाम की सैर को आये बुजुर्ग उन बच्चों को खेलते हुए रोज देखते थे और अपने बचपन को याद कर उनके खेल का आनन्द लेते थे। एक दिन उस व्यक्ति ने गार्ड बनने वाले बच्चे को पास बुलाकर बड़े ही कौतुहल से पूछा.... "बेटे , तुम रोज़ गार्ड बनते हो। तुम्हें कभी इंजिन या कभी डिब्बा बनने की इच्छा नहीं होती?" अब जरा उस बच्चे का जवाब सुनिए "बाबूजी, मेरे पास पहनने के लिए कोई शर्ट नहीं है। तो मेरे पीछे वाले बच्चे मुझे कैसे पकड़ेंगे... और मेरे पीछे कौन खड़ा रहेगा....?इसीलिए मैं रोज गार्ड बनकर ही खेल में हिस्सा लेता हूँ।" अपने ऑफिस से लौटते वक्त यदा कदा मैं भी उनके इस खेल को देखा करता था।जिस दिन वह बुजुर्ग गार्ड बनने वाले उस बच्चे से बात कर रहे थे...