भारत
ईसा की सातवीं शताब्दी में तथा पड़ोसी देशों से जो बर्बर गिरोह भारत मे आने शुरू हुए थे, तब से लेकर आज तक का इतिहास का अध्ययन दोषपूर्ण ही रहा है ।
मध्ययुग के भारत के इतिहास को अगर आप पढ़ेंगे, जिसमे लोलुप अंधविश्वासी अरब इस्लाम का प्रचार करने के बहाने धरती को रौंदते ओर खून की नदियां बहाते हुए चारो ओर बिखर रहे थे, तो आपकी रूह कांप उठेगी !!
यह आवारा खानाबदोश नैतिकता से हीन मुसलमान हर जगह गए, हर घर मे घुसे, इनके एक हाथ मे खून से भीगी तलवार थी, तो दूसरे हाथ मे जलती मशाल, यह व्यक्तियों को काटते थे, तो दूसरी ओर चीखती चिल्लाती महिलाओ को अपने हरम में बलात्कार के लिए घसीटते थे ।
इस्लाम किसी भी जाति या धर्म का ऐसा धर्म का ऐसा कलंक रूप है, जो शैतान की कलिमा को भी मात देता है । हमारा भारत भी उन देशों में था, जो बुरी तरह जले झुलसे थे, चीरे फाड़े गए थे, कुचले मसले गए थे, पंगु ओर अपंग बने थे, बंदी ओर कैदी बनाये गए थे ! यह खूंखार इस्लामिक आक्रमणकारी सागर की तरंगों के भांति लगातार आ रहे थे ।
इसी खूनी गिरोह का एक कुख्यात सरदार था, हरी आंखों वाला 18 साल का मुहम्मद बिन कासिम ! यह अर्धचंद्र अंकित इस्लाम के झंडे को उड़ाता हुआ आया था ! सिंधु नदी के दोनों ओर इसने जिस प्रलय की वर्षा की उसने, वास्तव में यह शैतानियत का नंगा नाच ही था !!
वर्षो के लंबे प्रयास के बाद ही कासिम का भारतीय सीमा में प्रवेश हो सका था । अरबो ने तो भारत को लूटने की प्लानिंग तो छठी शताब्दी में ही तैयार कर ली थी , लेकिन उस समय महाराज मिहिरभोज की मार यह लोग भूल ना पाए थे !
अनेक वर्ष तक यह मुसलमान टिड्डी दल की भांति भारत मे प्रविष्ट होकर आतंक फैलाते रहे, यहां की उपजाऊ भुमि को चूसते रहे, इतिहास ही नही, भूगोल के साथ भी इन्होंने अत्याचार और खिलवाड़ ही किया !! यह लोग भारत मे आकर बलात्कार, लूट और हत्या में लिप्त हो गए। इस्लाम धर्म के नाम पर अंतराष्ट्रीय लूट की सुसंगठित डकैती ही है, इसके हर काम शैतान के है, जिसने धर्म की चादर ओढ़ रखी थी।
635 ईस्वी में खलीफा उमर ने भारत पर पहला आक्रमण करवाया था । परन्तु वह स्वयं दूर ही एक सुरक्षित स्थान पर रहा ! गिरोह के जंगी नेता का नाम भी उमर ही था । उसके गिरोह ने बम्बई के नजदीक थाने में झप्पटा मारा था । उस समय भारत की रक्षा शक्ति बहुत मजबूत थी, एक भी शत्रु वापस जिंदा नही जा सका, इसका दुसरा कारण यह भी था, की बम्बई में उस समय गद्दार नही थे ।
कुछ ही समय बाद दूसरे गिरोह को भेजा गया, उनके हाकिम की हिम्मत यहां भी साथ आने की नही हुई, इस बार भी सारे लुटेरे मारे गए थे ।
भारत की सुरक्षा को भेदता हुआ एक लुटेरा गिरोह उत्तर की ओर बढ़ा ! इसने देवालय अर्थात देवालयपुर पर धावा किया, इसे आजकल "कराची" कहते है । यहां सुरक्षा के देवता का एक विशाल गुम्बद वाला मंदिर था, इसलिए उसे देवालयपुर कहते थे, उस मंदिर के गुम्बद पर लहराता हुआ भगवा झंडा कई मीलों दूर तक दिखाई देता था, इस अभियान को भी पूरी तरह कुचल दिया गया !!
इस समय तक अरब की खलीफा की गद्दी पर उस्मान आ चुका था । उसने अब्दुल्लाह को इराक़ का शासक घोषित किया, उसने अब्दुल्लाह को भारतीय सीमा ओर जासूसों की टोली भेजने का आदेश दिया, पूर्व आक्रमणों में हाकिम भी था, अतः नेता उसे ही बनाया गया, स्पष्ठ है हिन्दुओ ने उसे बंदी बनाकर कड़ा दण्ड दिया था, क्योकी वह वापस लौटने पर पूर्ण रूप से असंतुलित था । उसे बारम्बार तरह तरह के उलट-पुलट के प्रश्न पूछे गए, किन्तु वह बार बार यही रटता रहा, पानी का पूर्ण अभाव है, फल इक्के दुक्के होते है, डाकू ( हिन्दू ) बहुत बहादुर है ।अगर थोड़ी सेना भेजी गई, तो मार दी जाएगी, ओर ज़्यादा सेना भेज दी, तो खुद भूखों मर जाएगी ।
बात साफ है कि हिन्दू अल्लाह की तरह दयालु नही थे, उन्होंने हाकिम के मन मे अल्लाह से भी बड़ा खोफ अपना भर दिया था । इसी कारण उसने भारत का बड़ा अवसादपूर्ण चित्रण खलीफा के सामने प्रस्तुत किया । निराश ओर हताश होकर खलीफा ने आक्रमण करने का विचार ही त्याग दिया था ।
अब अली खलीफा बना, उसने इस दिशा में पुनः विचार किया ! भारत की सुंदर नारियों का लुभावना रूप और धन वैभव यह दोनों ऐसे प्रबल आकर्षण थे, जो मुसलमानो को अधिक समय तक रोक ना सके ।
इनकी आक्रमण पद्धति एक सांचे में ढली हुई थी, चाहे थल ओर हो जल, मुसलमानो की बस यही एक पद्धति थी, शहरों पर धावा करना, मनुष्यो को मार देना, स्त्रियों का अपहरण करना, बच्चो को उड़ा लाना, शहरों, ग्रामो तथा नगरों को जला देना, सारी संपत्ति छीन लेना, हिन्दू मंदिरो तथा भवनों को मस्जिद बना देना । सभी मनुष्यों को पिट धमकाकर या तो मुसलमान बना लेना, या मार देंना ।
अली ने अब्दी को नेता बनाकर भेजा था, इतिहासकार कहते है कि अब्दी विजयी हुआ था । उसने एक हजार हिन्दुओ का सिर काटकर फैंक दिया !! लेकिन कुछ लोगो को छोड़कर वह खुरासान में मारा गया ।
उसके बाद जियाद आया, वह मैंदो और जाटो से तलवार बजाता हुआ मारा गया । यह थे कासिम से आने के पूर्व 69 वर्ष । जहां भारत पर आक्रमण करने वाले मुसलमान जिंदा वापस नही जा सके ।
अपराधी अरबी मुसलमान भारत की सीमाओं पर पंजे मारते रहे, किसी भी शासक ने अरबी पशुओं को उनकी मांद तक नही खदेड़ा, किसी ने भी इन पशुओं का अंत नही किया ।
हिन्दुओ की एक पुरानी ओर परम्परागत बीमारी है, बड़ी पुरानी बीमारी । हम शत्रु को उसके घर तक रंगेद कर नही मारते । आज भी हमारी आंखे नही खुली है, आज भी हम ऐसा नही कर रहे है ।
इसका उदारहण है, एक छोटा सा पशु उपद्रवी शैतान कासिम जवान हो गया था । इस अत्याचारी शैतान ने अत्याचार की आंधी चला दी । 1 लाख हिन्दू महिलाओ को कैद कर लिया । सिंध के 90 उपशासको ( राणाओ ) का पतन हो गया, मीनार ओर मंच बनाकर मंदिरो को मस्जिद बना दिया, अतुलनीय सम्पदा लूट की, अत्याचार और अनाचार से सारा सिंध बंजर हो गया ।
लूटपाट की जो ठोस नीव मुहम्मद कासिम ने डाली, वह नीव हजार वर्षों तक फलती फूलती रही । अब भारत के गले मे यह फांसी का फंदा स्थाई रूप से बंध गया है । फांसी का यह फंदा दिन प्रतिदिन कसता ही जा रहा है। ओर भारत अभी तक धर्म निरपेक्षता की काल्पनिक ठंडी छांव में गहरी नींद सो रहा है, यह क्या मज़ाक है ??
कराची से बगदाद ओर दमिश्क जाने वाली सड़को पर हिन्दू बच्चो, स्त्रियों ओर मनुष्यो की हड्डियां सड़क और बिखरी पड़ी है, अनंत यातनाओं से उनके प्राण लिए गए है, इस मार्ग से अनेक शाखाये, अनेक पगडंडिया मिली है, यह है उनकी हजार वर्षों की लूट ।
राजा दाहिर की राजधानी अलोर थी, वह सिंध का एक प्रसिद्ध शहर था, वह चार शासकीय भागो में बंटा हुआ था । दाहिर एक शक्तिशाली और न्यायी हिन्दू राजा के रूप में विख्यात थे, उन्होंने कई बार अरबी आक्रमणकारियों को जड़ से नाश किया था । सीमा पर वह अपनी तीक्ष्ण दृष्टि रखते थे, श्री लंका से लूटकर लायी जाने वाली सम्पति महिलाओं को उसने बहुत बार आजाद करवाया, ओर अरबी सेना को मृत्यु के घाट उतारा था ! यही वजह थी, की अरब के मुसलमान उनसे घृणा करते थे, इससे हज्जाक को क्लेश होता था, क्यो की उसका लुटेरा अरबी दल भारतीय लोगो की लाशों पर नृत्य नही कर पा रहा था । पहले अब्दुल्ला ओर उसके बाद बशर को भारत पर धावा करने के लिए भेजा गया ! पूरी विशाल सेना समेत यह दोनो की कब्र राजा दाहिर ने बनवा दी थी ।
अपने पुरवर्ती सरदारों से हज्जाक निराश हो गया था । इस समय कासिम की उम्र 18 साल थी, उसकी बातों पर उसके ससुर हज्जाक को विश्वास हो गया, की वह भारत मे लूट मचा सकता है ।
इस समय सिंध में ब्राह्मणो के विरुद्ध बौद्धों ने अभियान छेड़ रखा था । राजा दाहिर का सेनापति " चच " बौद्धों से बहुत घृणा करता था, ओर बोद्ध उससे । चच हमेशा दाहिर से कहता कि यह बोद्ध कभी भी सिंध के विनाश का कारण बन सकते है, लेकिन दाहिर ने चच की बातों को कभी महत्व ही नही दिया ।।
इस भूल की कीमत ही दाहिर ने चुकाई भी, कासिम पहले अफगानिस्तान की ओर बढ़ा, यहां उसने हिन्दुओ का भयंकर कत्लेआम किया, ओर बौद्धों से मित्रता की !! यह देखकर बड़ी बोद्ध आबादी वाले सिंध में बौद्धों के मन मे कासिम के लिए प्रेम जाग उठा ।
मुसलमानो की बड़ी सेना अब कराची की ओर बढ़ी !! कराची पहुंचकर इन्होंने हिन्दुओ पर पत्थरबाजी आरम्भ कर दी । पत्थरबाजी से इन मल्लेचो का बड़ा पुराना नाता रहा है । एक विशाल सेना के सामने हिन्दू भी कमजोर पड़ने लगे, क्यो की ब्राह्मण विरोध में स्थानीय बोद्ध भी कासिम की पूरी मदद कर रहे थे, कई राणायो को तलवार की नोक पर कासिम ने रातों रात मुसलमान बना दिया । बलात्कार और हत्या का खूनी खेल कराची में चल पड़ा ।
इस प्रकार कुछ की गद्दारी से कासिम सिंधु भूमि में इतना आगे तक बढ़ चुका था । इतना सब होने के बाद भी दाहिर हार नही मान रहा था । अपनी सेना को उसने खुला आदेश दिया, की अंतिम समय तक युद्ध करें । संकट के इस काल में राजा दाहिर का एक मंत्री भयभीत हो उठा । उसने दाहिर से संधि की बात की ।
साहस के अवतार दाहिर ने उसे कहा " बड़े अपमान की बात है की तुम शांति और संधि की बात करते हो । जबकि तुम्हारे शत्रु तुम्हारी स्त्रियों को लूटना ओर उन्हें गुलाम बनाना चाहते है । तुम्हारे महलों ओर मंदिरो को नष्ठ कर उसे मस्जिद बनाना चाहते है। तुम्हे मुसलमान बनाकर तुम्हारा हिंदुत्व मिटाना चाहते है। ऐसे शांति की बाते करने वाले को जीने का कोई अधिकार नही, दाहिर ने एक झटके में उस मंत्री की गर्दन को धड़ से अलग कर दिया !!
राजा दाहिर ने सुरक्षा हेतु नगर की सारी स्त्रियों ओर बच्चो को रावत दुर्ग भेज दिया !! और यहां वो खुद रुक गए , अपनी पूरी सेना के साथ । कुछ विश्वासपात्र के साथ गद्दार सैनिक भी थे, लेकिन गद्दार कहाँ विश्वासपात्र हो सकते है !! आधी रात को उन्होंने दुर्ग का दरवाजा खोल दिया !! रातो रात दुर्ग से हिन्दू सेनिको की खून की नदियां बह गई !!
फिर भी युद्ध पांच दिन तक चला ! 20 जून 712 ई. को मुसलमानो ने अब युद्ध मे सेना के आगे उन बंदी महिलाओ को आगे कर दिया जिन्हें कासिम के लुटेरो ने जंजीरों में जकड़ रखा था, और इसी भीड़ में क़ासिम ने मुसलमान सेनिको को हिन्दू महिलाओं के वेष में शामिल कर दिया, इससे हिन्दू सैनिक उनपर वार भी नही कर पा रहे थे । स्त्रिया चीख रही थी चिल्ला रही थी, की " हे राजा दाहिर, हमारी रक्षा कीजिये, हम आपकी प्रजा है।
राजा ने हजारों की सँख्या में मातृशक्तियो को छुड़ाकर अपनी सैनिक टोली के बीच सुरक्षित स्थान पर भेज दिया और शेष महिलाओं की रक्षा के लिए तेजी से उस ओर बढ़ गये, जहां से रोने के स्वर आ रहे थे। इस दौड़भाग में उनके हाथी पर अग्निबाण चलाये गये, जिससे विचलित होकर वह खाई में गिर गया। यह देखकर शत्रुओं ने राजा को चारों ओर से घेर लिया। राजा ने बहुत देर तक संघर्ष किया; पर अंततः शत्रु सैनिकों के भालों से उनका शरीर क्षत-विक्षत होकर मातृभूमि की गोद में सदा को सो गया। इधर महिला वेश में छिपे मुस्लिम सैनिकों ने भी असली रूप में आकर हिन्दू सेना पर बीच से हमला कर दिया। इस प्रकार हिन्दू वीर दोनों ओर से घिर गये और मोहम्मद बिन कासिम का पलड़ा भारी हो गया। अंत तक लड़ते हुए वीर शिरोमणी सदा के लिए युद्ध के मैदान पर ही सो गया।
राजा दाहरसेन के बलिदान के बाद उनकी पत्नी लाड़ी और बहिन पद्मा ने भी युद्ध में वीरगति पाई। कासिम ने राजा का कटा सिर, छत्र और उनकी दोनों पुत्रियों (सूर्या और परमाल) को बगदाद के खलीफा के पास उपहारस्वरूप भेज दिया। जब खलीफा ने उन वीरांगनाओं का आलिंगन करना चाहा, तो उन्होंने रोते हुए कहा कि कासिम ने उन्हें अपवित्र कर आपके पास भेजा है। इससे खलीफा भड़क गया। उसने तुरन्त दूत भेजकर कासिम को सूखी खाल में सिलकर हाजिर करने का आदेश दिया।
जब कासिम की लाश बगदाद पहुंची, तो खलीफा ने उसे गुस्से से लात मारी। दोनों बहिनें महल की छत पर खड़ी थीं। जोर से हंसते हुए उन्होंने कहा कि हमने अपने देश के अपमान का बदला ले लिया है। यह कहकर उन्होंने एक दूसरे के सीने में विष से बुझी कटार घोंप दी और नीचे खाई में कूद पड़ीं। खलीफा अपना सिर पीटता रह गया।
बाद में इन दोनों बहनों की लाशों को घोड़े में बाँध कर पूरे बगदास में घसीटा गया ।
इस बीच क़ासिम सिंध की 50 % जनता को मुसलमान बना चुका था, सारे मंदिर तोड़ दिए उसने, उन्हें मस्जिद बना दिया । उन गद्दारो को यह कहकर काट दिया, जो तुम अपने लोगो के ना हुए, इस्लाम के क्या होओगे !!
कुछ गद्दारो की गद्दारी से भारत गुलाम बन गया ! 1000 साल के लिए गुलाम
आज धर्म की रक्षा के लिए पूरे परिवार को न्योछावर कर देने वाले उस महान धर्मरक्षक हिन्दू राजा दाहिरसेन को उनके बलिदान दिवस पर बारम्बार नमन 🙏
मध्ययुग के भारत के इतिहास को अगर आप पढ़ेंगे, जिसमे लोलुप अंधविश्वासी अरब इस्लाम का प्रचार करने के बहाने धरती को रौंदते ओर खून की नदियां बहाते हुए चारो ओर बिखर रहे थे, तो आपकी रूह कांप उठेगी !!
यह आवारा खानाबदोश नैतिकता से हीन मुसलमान हर जगह गए, हर घर मे घुसे, इनके एक हाथ मे खून से भीगी तलवार थी, तो दूसरे हाथ मे जलती मशाल, यह व्यक्तियों को काटते थे, तो दूसरी ओर चीखती चिल्लाती महिलाओ को अपने हरम में बलात्कार के लिए घसीटते थे ।
इस्लाम किसी भी जाति या धर्म का ऐसा धर्म का ऐसा कलंक रूप है, जो शैतान की कलिमा को भी मात देता है । हमारा भारत भी उन देशों में था, जो बुरी तरह जले झुलसे थे, चीरे फाड़े गए थे, कुचले मसले गए थे, पंगु ओर अपंग बने थे, बंदी ओर कैदी बनाये गए थे ! यह खूंखार इस्लामिक आक्रमणकारी सागर की तरंगों के भांति लगातार आ रहे थे ।
इसी खूनी गिरोह का एक कुख्यात सरदार था, हरी आंखों वाला 18 साल का मुहम्मद बिन कासिम ! यह अर्धचंद्र अंकित इस्लाम के झंडे को उड़ाता हुआ आया था ! सिंधु नदी के दोनों ओर इसने जिस प्रलय की वर्षा की उसने, वास्तव में यह शैतानियत का नंगा नाच ही था !!
वर्षो के लंबे प्रयास के बाद ही कासिम का भारतीय सीमा में प्रवेश हो सका था । अरबो ने तो भारत को लूटने की प्लानिंग तो छठी शताब्दी में ही तैयार कर ली थी , लेकिन उस समय महाराज मिहिरभोज की मार यह लोग भूल ना पाए थे !
अनेक वर्ष तक यह मुसलमान टिड्डी दल की भांति भारत मे प्रविष्ट होकर आतंक फैलाते रहे, यहां की उपजाऊ भुमि को चूसते रहे, इतिहास ही नही, भूगोल के साथ भी इन्होंने अत्याचार और खिलवाड़ ही किया !! यह लोग भारत मे आकर बलात्कार, लूट और हत्या में लिप्त हो गए। इस्लाम धर्म के नाम पर अंतराष्ट्रीय लूट की सुसंगठित डकैती ही है, इसके हर काम शैतान के है, जिसने धर्म की चादर ओढ़ रखी थी।
635 ईस्वी में खलीफा उमर ने भारत पर पहला आक्रमण करवाया था । परन्तु वह स्वयं दूर ही एक सुरक्षित स्थान पर रहा ! गिरोह के जंगी नेता का नाम भी उमर ही था । उसके गिरोह ने बम्बई के नजदीक थाने में झप्पटा मारा था । उस समय भारत की रक्षा शक्ति बहुत मजबूत थी, एक भी शत्रु वापस जिंदा नही जा सका, इसका दुसरा कारण यह भी था, की बम्बई में उस समय गद्दार नही थे ।
कुछ ही समय बाद दूसरे गिरोह को भेजा गया, उनके हाकिम की हिम्मत यहां भी साथ आने की नही हुई, इस बार भी सारे लुटेरे मारे गए थे ।
भारत की सुरक्षा को भेदता हुआ एक लुटेरा गिरोह उत्तर की ओर बढ़ा ! इसने देवालय अर्थात देवालयपुर पर धावा किया, इसे आजकल "कराची" कहते है । यहां सुरक्षा के देवता का एक विशाल गुम्बद वाला मंदिर था, इसलिए उसे देवालयपुर कहते थे, उस मंदिर के गुम्बद पर लहराता हुआ भगवा झंडा कई मीलों दूर तक दिखाई देता था, इस अभियान को भी पूरी तरह कुचल दिया गया !!
इस समय तक अरब की खलीफा की गद्दी पर उस्मान आ चुका था । उसने अब्दुल्लाह को इराक़ का शासक घोषित किया, उसने अब्दुल्लाह को भारतीय सीमा ओर जासूसों की टोली भेजने का आदेश दिया, पूर्व आक्रमणों में हाकिम भी था, अतः नेता उसे ही बनाया गया, स्पष्ठ है हिन्दुओ ने उसे बंदी बनाकर कड़ा दण्ड दिया था, क्योकी वह वापस लौटने पर पूर्ण रूप से असंतुलित था । उसे बारम्बार तरह तरह के उलट-पुलट के प्रश्न पूछे गए, किन्तु वह बार बार यही रटता रहा, पानी का पूर्ण अभाव है, फल इक्के दुक्के होते है, डाकू ( हिन्दू ) बहुत बहादुर है ।अगर थोड़ी सेना भेजी गई, तो मार दी जाएगी, ओर ज़्यादा सेना भेज दी, तो खुद भूखों मर जाएगी ।
बात साफ है कि हिन्दू अल्लाह की तरह दयालु नही थे, उन्होंने हाकिम के मन मे अल्लाह से भी बड़ा खोफ अपना भर दिया था । इसी कारण उसने भारत का बड़ा अवसादपूर्ण चित्रण खलीफा के सामने प्रस्तुत किया । निराश ओर हताश होकर खलीफा ने आक्रमण करने का विचार ही त्याग दिया था ।
अब अली खलीफा बना, उसने इस दिशा में पुनः विचार किया ! भारत की सुंदर नारियों का लुभावना रूप और धन वैभव यह दोनों ऐसे प्रबल आकर्षण थे, जो मुसलमानो को अधिक समय तक रोक ना सके ।
इनकी आक्रमण पद्धति एक सांचे में ढली हुई थी, चाहे थल ओर हो जल, मुसलमानो की बस यही एक पद्धति थी, शहरों पर धावा करना, मनुष्यो को मार देना, स्त्रियों का अपहरण करना, बच्चो को उड़ा लाना, शहरों, ग्रामो तथा नगरों को जला देना, सारी संपत्ति छीन लेना, हिन्दू मंदिरो तथा भवनों को मस्जिद बना देना । सभी मनुष्यों को पिट धमकाकर या तो मुसलमान बना लेना, या मार देंना ।
अली ने अब्दी को नेता बनाकर भेजा था, इतिहासकार कहते है कि अब्दी विजयी हुआ था । उसने एक हजार हिन्दुओ का सिर काटकर फैंक दिया !! लेकिन कुछ लोगो को छोड़कर वह खुरासान में मारा गया ।
उसके बाद जियाद आया, वह मैंदो और जाटो से तलवार बजाता हुआ मारा गया । यह थे कासिम से आने के पूर्व 69 वर्ष । जहां भारत पर आक्रमण करने वाले मुसलमान जिंदा वापस नही जा सके ।
अपराधी अरबी मुसलमान भारत की सीमाओं पर पंजे मारते रहे, किसी भी शासक ने अरबी पशुओं को उनकी मांद तक नही खदेड़ा, किसी ने भी इन पशुओं का अंत नही किया ।
हिन्दुओ की एक पुरानी ओर परम्परागत बीमारी है, बड़ी पुरानी बीमारी । हम शत्रु को उसके घर तक रंगेद कर नही मारते । आज भी हमारी आंखे नही खुली है, आज भी हम ऐसा नही कर रहे है ।
इसका उदारहण है, एक छोटा सा पशु उपद्रवी शैतान कासिम जवान हो गया था । इस अत्याचारी शैतान ने अत्याचार की आंधी चला दी । 1 लाख हिन्दू महिलाओ को कैद कर लिया । सिंध के 90 उपशासको ( राणाओ ) का पतन हो गया, मीनार ओर मंच बनाकर मंदिरो को मस्जिद बना दिया, अतुलनीय सम्पदा लूट की, अत्याचार और अनाचार से सारा सिंध बंजर हो गया ।
लूटपाट की जो ठोस नीव मुहम्मद कासिम ने डाली, वह नीव हजार वर्षों तक फलती फूलती रही । अब भारत के गले मे यह फांसी का फंदा स्थाई रूप से बंध गया है । फांसी का यह फंदा दिन प्रतिदिन कसता ही जा रहा है। ओर भारत अभी तक धर्म निरपेक्षता की काल्पनिक ठंडी छांव में गहरी नींद सो रहा है, यह क्या मज़ाक है ??
कराची से बगदाद ओर दमिश्क जाने वाली सड़को पर हिन्दू बच्चो, स्त्रियों ओर मनुष्यो की हड्डियां सड़क और बिखरी पड़ी है, अनंत यातनाओं से उनके प्राण लिए गए है, इस मार्ग से अनेक शाखाये, अनेक पगडंडिया मिली है, यह है उनकी हजार वर्षों की लूट ।
राजा दाहिर की राजधानी अलोर थी, वह सिंध का एक प्रसिद्ध शहर था, वह चार शासकीय भागो में बंटा हुआ था । दाहिर एक शक्तिशाली और न्यायी हिन्दू राजा के रूप में विख्यात थे, उन्होंने कई बार अरबी आक्रमणकारियों को जड़ से नाश किया था । सीमा पर वह अपनी तीक्ष्ण दृष्टि रखते थे, श्री लंका से लूटकर लायी जाने वाली सम्पति महिलाओं को उसने बहुत बार आजाद करवाया, ओर अरबी सेना को मृत्यु के घाट उतारा था ! यही वजह थी, की अरब के मुसलमान उनसे घृणा करते थे, इससे हज्जाक को क्लेश होता था, क्यो की उसका लुटेरा अरबी दल भारतीय लोगो की लाशों पर नृत्य नही कर पा रहा था । पहले अब्दुल्ला ओर उसके बाद बशर को भारत पर धावा करने के लिए भेजा गया ! पूरी विशाल सेना समेत यह दोनो की कब्र राजा दाहिर ने बनवा दी थी ।
अपने पुरवर्ती सरदारों से हज्जाक निराश हो गया था । इस समय कासिम की उम्र 18 साल थी, उसकी बातों पर उसके ससुर हज्जाक को विश्वास हो गया, की वह भारत मे लूट मचा सकता है ।
इस समय सिंध में ब्राह्मणो के विरुद्ध बौद्धों ने अभियान छेड़ रखा था । राजा दाहिर का सेनापति " चच " बौद्धों से बहुत घृणा करता था, ओर बोद्ध उससे । चच हमेशा दाहिर से कहता कि यह बोद्ध कभी भी सिंध के विनाश का कारण बन सकते है, लेकिन दाहिर ने चच की बातों को कभी महत्व ही नही दिया ।।
इस भूल की कीमत ही दाहिर ने चुकाई भी, कासिम पहले अफगानिस्तान की ओर बढ़ा, यहां उसने हिन्दुओ का भयंकर कत्लेआम किया, ओर बौद्धों से मित्रता की !! यह देखकर बड़ी बोद्ध आबादी वाले सिंध में बौद्धों के मन मे कासिम के लिए प्रेम जाग उठा ।
मुसलमानो की बड़ी सेना अब कराची की ओर बढ़ी !! कराची पहुंचकर इन्होंने हिन्दुओ पर पत्थरबाजी आरम्भ कर दी । पत्थरबाजी से इन मल्लेचो का बड़ा पुराना नाता रहा है । एक विशाल सेना के सामने हिन्दू भी कमजोर पड़ने लगे, क्यो की ब्राह्मण विरोध में स्थानीय बोद्ध भी कासिम की पूरी मदद कर रहे थे, कई राणायो को तलवार की नोक पर कासिम ने रातों रात मुसलमान बना दिया । बलात्कार और हत्या का खूनी खेल कराची में चल पड़ा ।
इस प्रकार कुछ की गद्दारी से कासिम सिंधु भूमि में इतना आगे तक बढ़ चुका था । इतना सब होने के बाद भी दाहिर हार नही मान रहा था । अपनी सेना को उसने खुला आदेश दिया, की अंतिम समय तक युद्ध करें । संकट के इस काल में राजा दाहिर का एक मंत्री भयभीत हो उठा । उसने दाहिर से संधि की बात की ।
साहस के अवतार दाहिर ने उसे कहा " बड़े अपमान की बात है की तुम शांति और संधि की बात करते हो । जबकि तुम्हारे शत्रु तुम्हारी स्त्रियों को लूटना ओर उन्हें गुलाम बनाना चाहते है । तुम्हारे महलों ओर मंदिरो को नष्ठ कर उसे मस्जिद बनाना चाहते है। तुम्हे मुसलमान बनाकर तुम्हारा हिंदुत्व मिटाना चाहते है। ऐसे शांति की बाते करने वाले को जीने का कोई अधिकार नही, दाहिर ने एक झटके में उस मंत्री की गर्दन को धड़ से अलग कर दिया !!
राजा दाहिर ने सुरक्षा हेतु नगर की सारी स्त्रियों ओर बच्चो को रावत दुर्ग भेज दिया !! और यहां वो खुद रुक गए , अपनी पूरी सेना के साथ । कुछ विश्वासपात्र के साथ गद्दार सैनिक भी थे, लेकिन गद्दार कहाँ विश्वासपात्र हो सकते है !! आधी रात को उन्होंने दुर्ग का दरवाजा खोल दिया !! रातो रात दुर्ग से हिन्दू सेनिको की खून की नदियां बह गई !!
फिर भी युद्ध पांच दिन तक चला ! 20 जून 712 ई. को मुसलमानो ने अब युद्ध मे सेना के आगे उन बंदी महिलाओ को आगे कर दिया जिन्हें कासिम के लुटेरो ने जंजीरों में जकड़ रखा था, और इसी भीड़ में क़ासिम ने मुसलमान सेनिको को हिन्दू महिलाओं के वेष में शामिल कर दिया, इससे हिन्दू सैनिक उनपर वार भी नही कर पा रहे थे । स्त्रिया चीख रही थी चिल्ला रही थी, की " हे राजा दाहिर, हमारी रक्षा कीजिये, हम आपकी प्रजा है।
राजा ने हजारों की सँख्या में मातृशक्तियो को छुड़ाकर अपनी सैनिक टोली के बीच सुरक्षित स्थान पर भेज दिया और शेष महिलाओं की रक्षा के लिए तेजी से उस ओर बढ़ गये, जहां से रोने के स्वर आ रहे थे। इस दौड़भाग में उनके हाथी पर अग्निबाण चलाये गये, जिससे विचलित होकर वह खाई में गिर गया। यह देखकर शत्रुओं ने राजा को चारों ओर से घेर लिया। राजा ने बहुत देर तक संघर्ष किया; पर अंततः शत्रु सैनिकों के भालों से उनका शरीर क्षत-विक्षत होकर मातृभूमि की गोद में सदा को सो गया। इधर महिला वेश में छिपे मुस्लिम सैनिकों ने भी असली रूप में आकर हिन्दू सेना पर बीच से हमला कर दिया। इस प्रकार हिन्दू वीर दोनों ओर से घिर गये और मोहम्मद बिन कासिम का पलड़ा भारी हो गया। अंत तक लड़ते हुए वीर शिरोमणी सदा के लिए युद्ध के मैदान पर ही सो गया।
राजा दाहरसेन के बलिदान के बाद उनकी पत्नी लाड़ी और बहिन पद्मा ने भी युद्ध में वीरगति पाई। कासिम ने राजा का कटा सिर, छत्र और उनकी दोनों पुत्रियों (सूर्या और परमाल) को बगदाद के खलीफा के पास उपहारस्वरूप भेज दिया। जब खलीफा ने उन वीरांगनाओं का आलिंगन करना चाहा, तो उन्होंने रोते हुए कहा कि कासिम ने उन्हें अपवित्र कर आपके पास भेजा है। इससे खलीफा भड़क गया। उसने तुरन्त दूत भेजकर कासिम को सूखी खाल में सिलकर हाजिर करने का आदेश दिया।
जब कासिम की लाश बगदाद पहुंची, तो खलीफा ने उसे गुस्से से लात मारी। दोनों बहिनें महल की छत पर खड़ी थीं। जोर से हंसते हुए उन्होंने कहा कि हमने अपने देश के अपमान का बदला ले लिया है। यह कहकर उन्होंने एक दूसरे के सीने में विष से बुझी कटार घोंप दी और नीचे खाई में कूद पड़ीं। खलीफा अपना सिर पीटता रह गया।
बाद में इन दोनों बहनों की लाशों को घोड़े में बाँध कर पूरे बगदास में घसीटा गया ।
इस बीच क़ासिम सिंध की 50 % जनता को मुसलमान बना चुका था, सारे मंदिर तोड़ दिए उसने, उन्हें मस्जिद बना दिया । उन गद्दारो को यह कहकर काट दिया, जो तुम अपने लोगो के ना हुए, इस्लाम के क्या होओगे !!
कुछ गद्दारो की गद्दारी से भारत गुलाम बन गया ! 1000 साल के लिए गुलाम
आज धर्म की रक्षा के लिए पूरे परिवार को न्योछावर कर देने वाले उस महान धर्मरक्षक हिन्दू राजा दाहिरसेन को उनके बलिदान दिवस पर बारम्बार नमन 🙏