संदेश

नवंबर, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

अनोखी दवाई

चित्र
#अनोखी_दवाई काफी समय से दादी की तबियत खराब थी .  घर पर ही दो नर्स उन की देखभाल करतीं थीं . डाक्टरों ने भी अपने हाथ उठा दिए थे और कहा था कि जो भी सेवा करनी है कर लीजिये . दवाइयां अपना काम नहीं कर रहीं हैं . . उसने घर में बच्चों को होस्टल से बुला लिया . काम के कारण दोनों मियां बीबी काम पर चले जाते . . दोनों बच्चे बार-बार अपनी दादी को देखने जाते . दादी ने आँखें खोलीं तो बच्चे दादी से लिपट गए . . 'दादी ! पापा कहते हैं कि आप बहुत अच्छा खाना बनाती हैं . हमें होस्टल का खाना अच्छा नहीं लगता . क्या आप हमारे लिए खाना बनाओगी ?' . नर्स ने बच्चों को डांटा और बाहर जाने को कहा . अचानक से दादी उठी और नर्स पर बरस पड़ीं . . 'आप जाओ यहाँ से . मेरे बच्चों को डांटने का हक़ किसने दिया है ? खबरदार अगर बच्चों को डांटने की कोशिश की !' . 'कमाल करती हो आप . आपके लिए ही तो हम बच्चों को मना  किया . बार-बार आता है तुमको देखने और डिस्टर्ब करता है . आराम भी नहीं करने देता .' . 'अरे ! इनको देखकर मेरी आँखों और दिल को कितना आराम मिलता है तू क्या जाने ! ऐसा कर मुझे जरा नहाना...

विद्यालय पर निबंध

विद्यालय पर निबंध ------------------------ "ये क्या लिख दिया बे ?" मंगरुआ सहमा हुआ, एक कोना  में देवाल से चिपका जा रहा था, और फुलेसर मास्टर एक हाथ मे डंडा तो दूसरे हाथ मे मंगरुआ की काँपी लेकर उसकी ओर बढ़े आ रहे थे। मास्टर साहेब फिर चिचियाये - अबे बोलता काहे नहीं है? क्या एहि पढ़ाए थे हम्म ? मंगरुआ हिम्मत करके कहा - लेकिन माट साब आप स्कूल के जो लच्छण बताये थे, वो मुझे कभी नहीं दिखे , इसलिए जो दिखा ओही लिख दिया । का दिखा बे हरिश्चंदर की औलाद ? जो दिखेगा वही लिख देगा ? अब तुम से एगो निबंध लिखाने की खातिर स्कूलवा को मुगल गार्डन बना दें ? शान्ति प्रिय हेडमास्टर साहब ने शोरगुल सुना तो मनोहर कहानियां के नवीन संस्करण को कांख में दबाया और कक्षा में दाखिल होते ही पूछा - ई सब का है माट साब ? काहें शोर मचाये हैं ? फुलेसर गुरुजी डंडा को मंगरुआ के पेट में कोंचते हुए गरजे - इसी से पूछिए सर , देखिए विद्यालय पर क्या निबंध लिखा है इस बकलोल ने । हेड मास्टर साहब ने मंगरुआ की कॉपी पर नजर दौड़ाई , लिखा था .... मेरा विद्यालय गांव के बाहर मुर्गीबाड़े के बगल में स्थित है । मु...

शुभ दिपावली

चित्र
अब चूने में नील मिलाकर पुताई का जमाना नहीं रहा। चवन्नी, अठन्नी का जमाना भी नहीं रहा। हफ्तों पहले से साफ़-सफाई में जुट जाते हैं चूने के कनिस्तर में थोड़ी नील मिलाते हैं अलमारी खिसका खोयी चीज़ वापस पाते हैं दोछत्ती का कबाड़ बेच कुछ पैसे कमाते हैं चलो इस दफ़े दिवाली घर पे मनाते हैं .... दौड़-भाग के घर का हर सामान लाते हैं चवन्नी -अठन्नी पटाखों के लिए बचाते हैं सजी बाज़ार की रौनक देखने जाते हैं सिर्फ दाम पूछने के लिए चीजों को उठाते हैं चलो इस दफ़े दिवाली घर पे मनाते हैं .... बिजली की झालर छत से लटकाते हैं कुछ में मास्टर बल्ब भी लगाते हैं टेस्टर लिए पूरे इलेक्ट्रीशियन बन जाते हैं दो-चार बिजली के झटके भी खाते हैं चलो इस दफ़े दिवाली घर पे मनाते हैं .... दूर थोक की दुकान से पटाखे लाते है मुर्गा ब्रांड हर पैकेट में खोजते जाते है दो दिन तक उन्हें छत की धूप में सुखाते हैं बार-बार बस गिनते जाते है चलो इस दफ़े दिवाली घर पे मनाते हैं .... धनतेरस के दिन कटोरदान लाते है छत के जंगले से कंडील लटकाते हैं मिठाई के ऊपर लगे काजू-बादाम खाते हैं प्रसाद की थाली पड़ोस में देने जाते हैं चल...

अच्छे लोग, अच्छी सोंच....

जब डॉक्टर ने ये बताया था ना , बधाई हो बेटी हुई है । मैंने लड्डू बांट दिए थे पूरे अस्पताल में क्योंकि मुझे शिखा ( पत्नी) जैसी बेटी ही चाहिए थी ।जब चलती थी ना  तो उसके छोटे छोटे पैरों की  पायल की गूंज पूरे घर में दौड़ जाती थी ।मुझे याद है उसने पहली बार जब पापा बोला था। कितना खुश था मैं । मैंने उसे अपने गोद में उठा लिया  घंटों में उससे बोलता रहा , बेटा पापा बोलो , पा.....पा ,पा......पा और वो गर्दन मटकाने लगती । मैं उसकी हर नादानी पर बहुत हंसता । जब वो पांचवी में थी उसने पापा के ऊपर निबंध लिखा । उसने लिखा मेरे पापा हीरो है ।जो उसने अपने शब्दों में लिखा था , दुनिया में ऐसी कोई चीज नहीं है जो पापा मेरे लिए नहीं ला सकते और ऐसा कोई काम नहीं जिसे पापा नहीं कर सकते । मेरे पापा अलादीन के चिराग हैं ।मैंने न जाने कितनी बार उस निबंध को पढ़ा । जब भी मैं उसे पढ़ता तो मुझे एक सफल पिता की झलक उसमें दिखती अपनी मां की चुन्नी ओढ़कर अक्सर मुझे खाना बनाकर खिलाती ।  धीरे धीरे मेरी  प्लास्टिक की गुड़िया दादी अम्मा बन गई  ।मैं उसमें अपनी मां की छवि देखता  ।हर बात पर मुझे ...