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जून, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मंदसौर बलात्कार काँड

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मंदसौर बलात्कार काँड पर गगनभेदी सेकुलर चुप्पी क्यो? मध्य प्रदेश का मंदसौर जल रहा है, लेकिन राहुल गांधी नदारद हैं। मंदसौर के लोग हजारों की संख्या में लोग सड़कों पर हैं, लेकिन मीडिया मौन है। तथाकथित बुद्धिजीवियों और सेक्यूलरवादियों की जुबानों पर ताले लगे हैं। बॉलीवुड के सेक्यूलरों को भी आज हिंदुस्तानी होने पर शर्म नहीं आ रही है। लेखक शायर की कलम जम गई। जानते हैं क्यों? क्योंकि वहां एक 7 साल की हिंदू बच्ची के साथ बलात्कार हुआ है और रेप करने वाला एक मुसलमान है। इस तरह की बातें आपको हैरत में जरूर डालती होंगी। आप सोचते होंगे कि यह तो अपराध है, इसमें हिंदू-मुस्लिम क्यों? दरअसल ये सीमा रेखा हमने नहीं बल्कि कांग्रेसी, वामपंथी और तथाकथित सेक्यूलरवादियों ने खींची हैं। आरोप है कि इरफान नाम के दरिंदे ने बच्ची का रेप उसे काफिर… यानि दूसरे धर्म का समझकर किया था। मोहम्मद इरफान ने 7 साल की बच्ची को उठाया और उसका रेप किया, उसे मारने की कोशिश की, जब उसे लगा कि बच्ची मर गई है तो इसने उसे झाड़ियों में फेंक दिया और भाग गया। भागने से पहले उसने बच्ची की गुप्तांग दांतों से काटा, उसकी अंतड़ियां नि...

रिस्ता

एक मित्र ने भेजा था पसंद आया तो आप सब के बीच रख रहा हुं थोड़ा समय लगेगा लेकिन पढ़ना जरूर, आंसू आ जाए तो जान लेना आपकी भावनाएं जीवित हैं .... बात बहुत पुरानी है। आठ-दस साल पहले की है  ।  मैं अपने एक मित्र का पासपोर्ट बनवाने के लिए दिल्ली के पासपोर्ट ऑफिस गया था। उन दिनों इंटरनेट पर फार्म भरने की सुविधा नहीं थी। पासपोर्ट दफ्तर में दलालों का बोलबाला था और खुलेआम दलाल पैसे लेकर पासपोर्ट के फार्म बेचने से लेकर उसे भरवाने, जमा करवाने और पासपोर्ट बनवाने का काम करते थे। मेरे मित्र को किसी कारण से पासपोर्ट की जल्दी थी, लेकिन दलालों के दलदल में फंसना नहीं चाहते थे। हम पासपोर्ट दफ्तर पहुंच गए, लाइन में लग कर हमने पासपोर्ट का तत्काल फार्म भी ले लिया। पूरा फार्म भर लिया। इस चक्कर में कई घंटे निकल चुके थे, और अब हमें िकसी तरह पासपोर्ट की फीस जमा करानी थी। हम लाइन में खड़े हुए लेकिन जैसे ही हमारा नंबर आया बाबू ने खिड़की बंद कर दी और कहा कि समय खत्म हो चुका है अब कल आइएगा। मैंने उससे मिन्नतें की, उससे कहा कि आज पूरा दिन हमने खर्च किया है और बस अब केवल फीस जमा कराने की बात रह गई...

भारत

ईसा की सातवीं शताब्दी में तथा पड़ोसी देशों से जो बर्बर गिरोह भारत मे आने शुरू हुए थे, तब से लेकर आज तक का इतिहास का अध्ययन दोषपूर्ण ही रहा है । मध्ययुग के भारत के इतिहास को अगर आप पढ़ेंगे, जिसमे लोलुप अंधविश्वासी अरब इस्लाम का प्रचार करने के बहाने धरती को रौंदते ओर खून की नदियां बहाते हुए चारो ओर बिखर रहे थे, तो आपकी रूह कांप उठेगी !! यह आवारा खानाबदोश नैतिकता से हीन मुसलमान हर जगह गए, हर घर मे घुसे, इनके एक हाथ मे खून से भीगी तलवार थी, तो दूसरे हाथ मे जलती मशाल, यह व्यक्तियों को काटते थे, तो दूसरी ओर चीखती चिल्लाती महिलाओ को अपने हरम में बलात्कार के लिए घसीटते थे । इस्लाम किसी भी जाति या धर्म का ऐसा धर्म का ऐसा कलंक रूप है, जो शैतान की कलिमा को भी मात देता है । हमारा भारत भी उन देशों में था, जो बुरी तरह जले झुलसे थे, चीरे फाड़े गए थे, कुचले मसले गए थे, पंगु ओर अपंग बने थे, बंदी ओर कैदी बनाये गए थे ! यह खूंखार इस्लामिक आक्रमणकारी सागर की तरंगों के भांति लगातार आ रहे थे । इसी खूनी गिरोह का एक कुख्यात सरदार था, हरी आंखों वाला 18 साल का मुहम्मद बिन कासिम !  यह अर्धचंद्र अंकित इस...

परफेक्ट वुमन

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परफेक्ट वुमन............ जब से गौरी के ससुर का स्वर्गवास हुआ था, उनका ऊपर का खाली कमरा उसे काटने को दौड़ता. पति अनुज सुबह के गए रात तक लौटते, उसका इस अकेले घर में ज़रा भी मन न लगता. कमरे के साथ अटैच्ड बाथरूम और किचन भी था. बहुत सोच-विचारकर उसने वहां एक किराएदार रखने की सोची. वैसे भी नोएडा के उस कमर्शियल एरिया में ऐसे कमरों के लिए बहुत ऊंचे किराए मिल रहे थे, अतः उसने कॉलोनी के किराना स्टोर पर एडवरटाइज़मेंट लगा दी. उसे ही पढ़कर पाखी आई थी. मुंह में च्यूइंगम, चुस्त आधुनिक लिबास, हाई हील्स की सैंडल और इधर-उधर दौड़ती लापरवाह-सी नज़रें. बिल्कुल बिंदास. किसी मल्टीनेशनल कंपनी में एक्ज़ीक्यूटिव थी. “देखिए, मेरी शिफ्ट्स में ड्यूटी रहती है. वर्किंग ऑवर भी फिक्स नहीं है, सो रात को अक्सर लेट भी हो जाता है. यदि आप लोगों को इस बात पर आपत्ति है, तो पहले से ही बता दें. पिछली जगह जहां रहती थी, उन्हें मेरे देरी से आने पर प्रॉब्लम थी. यू नो दिस मिडल क्लास मेंटेलिटी… लड़की के लेट आने को सीधे कैरेक्टर से जोड़ते हैं…” पाखी आंखें चढ़ाते हुए बोली. गौरी के कान खड़े हुए… वैसे भी पाखी गौरी की उपस्थिति लगभग नकारते हुए ...

ईश्वर की सत्ता है...

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ईश्वर की सत्ता है हमें ईश्वर को मनाना ही पड़ता है।।  स्टीफन हाकिंग (ब्रह्मांड वैज्ञानिक) का मानना था -  "सृष्टि रचना में ईश्वर का कोई योगदान नही है, ईश्वर काल्पनिक है" आइए उक्त बात की समीक्षा करें -- कारण के बिना कार्य नही होता!! गति के नियमानुसार परमाणु/कण तब तक गति नही करते जब तक कोई बाह्य बल उस पर कार्य न करे, सृष्टि बनने से पूर्व परमाणुओं में स्वतः गति कैसे हुई?? .......1 जहाँ बुद्धि पूर्वक की गई रचना है, वहां रचने वाला क्यों न माना जावे ?? घड़ा भी स्वतः नही बनता, जब तक कोई बुद्धि पूर्वक उसे नही बनावे, चाहे मिट्टी विधमान हो! फिर ये व्यवस्था में चलने वाली सृष्टि बिना किसी बुद्धिमान के कैसे बनी? .........2 आधुनिक विज्ञान के अनुसार सूर्य-पृथ्वी की दूरी, आकार व द्रव्यमान बहुत नाप तोल कर रखा गया है? इसे हेबिटेबल जोन कहते है! यदि सूर्य के अधिक निकट होती तो जल जाती, दूर होती तो जम जाती, अधिक बड़ी होती तो दूरी बढ़ानी पड़ती, छोटी होती तो कम करनी पड़ती आदि, ये बुद्धि किसकी है ? क्या जड़(बुद्धि रहित) पृथ्वी व सूर्य ने स्वयं तय कर लिया मैं इस आकार की बन जाती हूँ, और इ...

सपना

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पचास वर्षीय राजेश बाबू ने सुबह सुबह करवट ली और हमेशा की तरह अपनी पत्नी मीता को चाय बनाने को कहा और फिर रजाई ढक कर करवट ले ली. कुछ पल उन्होने इंतजार की पर कोई हलचल ना होने पर उन्होने दुबारा आवाज दी. . ऐसा कभी भी नही हुआ था इसलिए राजेश बाबू ने लाईट जलाई और मीता को हिलाया पर कोई हलचल ना होने पर ना जाने वो घबरा से गए. रजाई हटाई तो मीता निढाल सी एक ओर पडी थी. ना जाने रात ही रात मे क्या हो गया. . अचानक मीता का इस तरह से उनकी जिंदगी से हमेशा हमेशा ले लिए चले जाना …. असहनीय था. धीरे धीरे जैसे पता चलता रहा लोग इकठठे होते रहे और उसका अंतिम संस्कार कर दिया. . एक हफ्ता किस तरह बीता उन्हे कुछ याद ही नही. उन का एक ही बेटा था जो कि अमेरिका रहता था. पढाई के बाद वही नौकरी कर ली थी. बेटा आकर जाने की भी तैयारी कर रहा था. . उसने अपने पापा को भी साथ चलने को कहा और वो तैयार भी हो गए. पर मीता की याद को अपने दिल से लगा लिया था. अब उन्हे हर बात मे उसकी अच्छाई ही नजर आने लगी.उन्हे याद आता कि कितना ख्याल रखती थी मीता उनका पर वो कोई भी मौका नही चूकते थे उसे गलत साबित करने का. ना कभी उसकी तारीफ...

जातीवाद और ब्राह्मण

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जातीवाद और ब्राह्मण ब्राह्मणों को गाली देना, कोसना, उन्हें कर्मकांडी, पाखंडी, लालची, भ्रष्ट, ढोंगी जैसे विशेषणों के द्वारा अपमानित करना आजकल ट्रेंड में है। कुछ लोग ब्राह्मणों को सबक सिखाना चाहते हैं, कुछ उनसे तलवे चटवाना चाहते हैं, कुछ स्वघोषित तरीके से उनके दामाद बन जाना चाहते हैं, कुछ उन्हें मंदिरों से बाहर कर देना चाहते हैं.. वगैरह-वगैरह। कुछ कथित रूप से पिछड़े लोगों को लगता है कि ब्राह्मणों की वजह से ही वो 'पिछड़े' रह गये, दलितों की अपनी दलीलें हैं, कभी-कभी अन्य जातियों के लोगों के श्रीमुख से भी इस तरह की बातें सुनने को मिल जाती हैं। आमतौर से ये धारणा बनाई जा रही है कि ब्राह्मणों की वजह से समाज पिछड़ा रह गया, लोग अशिक्षित रह गये, समाज जातियों में बंट गया, देश में अंधविश्वासों को बढ़ावा मिला.. वगैरह-वगैरह। आज, ऐसे सभी माननीयों को हृदय से धन्यवाद देते हुए मैं आपको जवाब दे रहा हूं... और याद रहे- ये एक ब्राह्मण का जवाब है... इस वैधानिक चेतावनी के साथ कि मैं किसी प्रकार की जातीय श्रेष्ठता में विश्वास नहीं रखता।         लेकिन आप जान लीजिये- वो कौटिल्य जिस...

जीवन संध्या

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जीवन संध्या . पार्क के एक कोने में बेंच पर विशालजी चुपचाप बैठे थे. चारों तरफ़ फूल खिले हुए थे, बच्चे खेलने में मग्न थे. शाम के साये लंबे होने लगे थे. एक ठंडी सांस खींचकर उन्होंने उठने की कोशिश की, पर फिर बैठ गए. विचारों के भंवर में एक बार फिर गोते लगाने लगे. यह रिटायरमेंट उन पर भारी पड़ रहा था. पहले सुबह तैयार होकर ऑफिस चले जाते थे. सारा दिन कैसे कट जाता था, पता ही नहीं चलता था. टेलिफोन, मीटिंग, फाइलें, पार्टियां, क्लब- क्या नहीं था उनकी ज़िंदगी में. ठाठ ही ठाठ थे. समय कैसे भाग रहा था कुछ पता ही नहीं चलता था, लेकिन एक दिन अचानक जब पत्नी राधिका को दिल का दौरा पड़ा, तब यूं लगा मानो ज़िंदगी रुक-सी गई है. राधिका के जाने के बाद जीवन में खालीपन-सा आ गया. घर में बेटा सुहास व बहू लक्ष्मी, पोता रोहन और पोती रोहिणी सभी उनका बहुत ख़्याल रखते थे, परंतु रिटायरमेंट के बाद समय काटे नहीं कट रहा था. बच्चे अपने स्कूल और सुहास व लक्ष्मी अपने-अपने ऑफिस चले जाते थे. उनके लिए तो बस ‘हाय पापा-बाय पापा’ से आगे बातों के लिए समय ही कहां था? हां! उन्हें याद आया कि कॉलेज के दिनों में उनके प्रोफेसर रामदयाल अक्स...

पवित्र रिश्ता

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पवित्र रिश्ता  "रवि office से घर आते ही पत्नी पूजा से बोला-मुझे तलाक चाहिए.. पूजा तलाक शब्द सुनते ही रो पडी 8साल का रिश्ता दोनों का एक 7 साल का बेटा फिर तलाक क्यों  , रवि बोला-office मे रेखा से पिछले 6महीने से अफेयर चल रहा हे ओर हम दोनों अब शादी करना चाहते है तलाक दे दो, बदले मे घर दौलत सबकुछ आधा तुम्हारे नाम कर दिया है , तलाक ओर जायदाद के पेपर देकर बोला ,पूजा सारी रात रोती रही, अगले दिन सुबह बेटे के स्कूल जाने के बाद पूजा रवि से बोली-मुझे तुमहारी धन दौलत कुछ नही चाहिए तुम्हें मुझसे मुक्ति चाहिए मिल जाएगी  मगर मेरी 3 शर्ते माननी होगी (1)   30 दिन तक पहले के जैसे पति पत्नी के रूप मे रहेंगे कोई चेहरे पर शिकन नही होगी (2)हमारे बेटे को तलाक के बारे कुछ पता नही चलना चाहिए (3) office से आते ही शादी के शुरुआत के दिनो की तरह मुझे गोदी मे उठाकर चूमते हुए पलंग पर बिठाना होगा, अगर मंजूर हो तो वादा रहा 30 दिन मे तुम्हें मुझसे मुक्ति मिल जाएगी, रवि बहुत खुश था बगैर पैसे सबकुछ उसके मन मुताबिक हो रहा था ,ओर फिर अगले दिन office से आते ही रवि ने पूजा को गोदी मे ...

भिखारी की मानवता

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राजू कईं दिनों से बेरोजगार था, एक एक रूपये की कीमत जैसे करोड़ो लग रही थी, इस उठापटक में था कि कहीं नौकरी लग जाए। आज उसका एक इंटरव्यू था, पर दूसरे शहर और जाने के लिए जेब में सिर्फ दस रूपये थे ।राजू को कम से कम पांच सौ की जरूरत थी।अपने एकलौते इन्टरव्यू वाले कपड़े रात में धो पड़ोसी की प्रेस मांग के तैयार कर पहन अपने योग्ताओं की मोटी फाइल बगल में दबा कर दो बिस्कुट खा के निकला, लिफ्ट ले, पैदल जैसे तैसे चिलचिलाती धूप में तरबतर बस स्टेंड शायद कोई पहचान वाला मिल जाए। काफी देर खड़े रहने के बाद भी कोई न दिखा। राजू के मन में घबराहट और मायूसी थी, क्या करूंगा अब कैसे पहचूंगा। पास के मंदिर पर जा पहुंचा, दर्शन कर सीढ़ियों पर बैठा था पास में ही एक फकीर बैठा था, उसके कटोरे में राजू की जेब और बैंक एकाउंट से भी ज्यादा पैसे पड़े थे, उसने नजरे और हालत समझ के बोला "कुछ मदद कर सकता हूं क्या"। राजू मुस्कुराता बोला "आप क्या मदद करोगे।" "चाहो तो मेरे पूरे पैसे रख लों।" वो मुस्कुराता बोला। राजू चौंक गया उसे कैसे पता मेरी जरूरत मैने कहा "क्यों ...?" "शायद आप...

आनन्द कि अनुभूति

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बेल बजी तो द्वार खोला। द्वार पर शिवराम खड़ा था। शिवराम हमारी कॉलोनी के लोगों की गाड़ियाँ, बाइक्स वगैरह धोने का काम करता था। " साहब, जरा काम था। " " तुम्हारी पगार बाकी है क्या, मेरी तरफ ? " " नहीं साहब, वो तो कब की मिल गई। पेड़े देने आया था, बेटा दसवीं पास हो गया। " " अरे वाह ! आओ अंदर आओ। " मैंने उसे बैठने को कहा। उसने मना किया लेकिन फिर, मेरे आग्रह पर बैठा। मैं भी उसके सामने बैठा तो उसने पेड़े का पैकेट मेरे हाँथ पर रखा। " कितने मार्क्स मिले बेटे को ? " " बासठ प्रतिशत। " " अरे वाह ! " उसे खुश करने को मैं बोला। आजकल तो ये हाल है कि, 90 प्रतिशत ना सुनो तो आदमी फेल हुआ जैसा मालूम होता है। लेकिन शिवराम बेहद खुश था। " साहब, मैं बहुत खुश हूँ। मेरे खानदान में इतना पढ़ जाने वाला मेरा बेटा ही है। " " अच्छा, इसीलिए पेड़े वगैरह ! " शिवराम को शायद मेरा ये बोलना अच्छा नहीं लगा। वो हलके से हँसा और बोला, " साहब, अगर मेरी सामर्थ्य होती तो हर साल पेड़े बाँटता। मेरा बेटा बहुत होशियार ...