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मई, 2019 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

“सॉरी, रांग नम्बर”

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“हैलो...हैलो...अंकित बेटा...हम पहुँचने वाले हैं...ट्रेन आउटर पर खड़ी है।” “अच्छा पापा, मैं भी निकलता हूँ ऑफिस से, बस दस मिनट में स्टेशन पहुँच जाऊँगा। आप वेटिंग रूम में बैठ जाइएगा” कहकर अंकित ने फोन काट दिया। उधर ट्रेन में बैठे राजेन्द्र जी और उनकी पत्नी उर्मिला ने भी बड़े उत्साह से अपना बैग-अटैची सँभाल ली क्योंकि दिल्ली का स्टेशन आने वाला ही था। गाड़ी भी रेंगने लगी थी। उर्मिला ने बहुत गद्गद् होते हुए कहा, “पता ही नहीं चला कि पाँच साल कैसे बीत गये? लड्डू भी तो अब बोलने लगा है।” राजेन्द्र जी भी मुस्कुराकर बोले, “हाँ...अगर उसने फोन पर नहीं कहा होता कि ‘दादा दी तब आओदे’ ...तो मैं आता नहीं। पाँच साल में एकबार भी नहीं बुलाया अंकित और सलोनी ने।” “ओफ्फो! आप तो हर समय झुँझलाते ही रहते हैं। अरे बच्चे अपने काम में बिजी थे कि हमारी देखभाल करते। दोनों को ऑफिस जाना होता है। खाली घर में क्या करते हम? ठीक है, अब बुला लिया ना?” उर्मिला ने समझाते हुए कहा, “अच्छा सुनिए, उनके फंक्शन में कुछ भी हो ज्यादा टेंशन मत करना...दिल्ली का सिस्टम अलग है।” “हाँ-हाँ जानता हूँ...चलो प्लेटफार्म आ गया”...

आरक्षण

 हमें आरक्षण से कोई आपत्ति नहीं है !           समस्या तो यह है कि ~ जिसको आरक्षण दिया जा रहा है , वो सामान्य आदमी बन ही नहीं पा रहा है !         समय सीमा तय हो कि ~          वह सामान्य नागरिक           कब तक बन जायेगा ? किसी व्यक्ति को आरक्षण दिया गया और वो किसी सरकारी नौकरी में आ गया ! अब उसका वेतन ₹5500 से ₹50000 व इससे भी अधिक है , पर जब उसकी संतान हुई तो वह भी पिछडी ही पैदा हुई ,           और ... हो गई शुरुआत ! उसका जन्म हुआ प्राईवेट अस्पताल में ~   पालन पोषण हुआ राजसी माहोल में ~       फिर भी वह गरीब पिछड़ा और     सवर्णों के अत्याचार का मारा  हुआ ? उसका पिता लाखों रूपए सालाना कमा   रहा है , तथा उच्च पद पर आसीन है !     सारी सरकारी सुविधाएं  ले रहा है !            वो खुद जिले के ...  सबसे अच्छे स्कूल में पढ़ रहा है , और    सरकार ... उसे...

संगिनी

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पति पत्नी के बीच प्रेम क्या होता है कोई  विजेंद्र सिंह राठौड़ से सीखे ! यह तस्वीर अजेमर के निवासी विजेंद्र सिंह राठौड़ और उनकी धर्मपत्नी लीला की है। 2013 में लीला ने विजेंद्र से आग्रह किया के वह चार धाम की यात्रा करना चाहती हैं। विजेंद्र एक ट्रेवल एजेंसी में कार्यरत थे। इसी दरमियां ट्रैवेल एजेंसी का एक टूर केदारनाथ यात्रा जाने के लिये निश्चित हुआ। पतिपत्नी ने अपना बोरिया बिस्तर बांधा और केदारनाथ जा पहुंचे। विजेंद्र और लीला एक लॉज में रुके थे। लीला को लॉज में छोड़ विजेंद्र कुछ दूर ही गये थे के चारों ओर हाहाकार मच गई। उत्तराखंड में आई भीषण बाढ़ का उफनता पानी केदारनाथ आ पहुंचा था। विजेंद्र ने बामुश्किल अपनी जान बचाई। मौत का तांडव और उफनते हुये पानी का वेग शांत हुआ तो विजेंद्र बदहवास होकर उस लॉज की ओर दौड़े जहाँ वह लीला को छोड़ कर आये थे। परन्तु वहाँ पहुंच कर जो नज़ारा दिखा वह दिल दहला देने वाला था। सब कुछ बह चुका था। प्रकृति के इस तांडव के आगे वहां मौजूद हर इंसान बेबस दिख रहा था। तो क्या लीला भी ..... नहीं नहीं। ऐसा नहीं हो सकता।विजेंद्र ने अपने मन को समझाया। "वह जीवित है" विजे...