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राष्ट्रपिता / सिर्फ गांधी

राष्ट्रपिता / सिर्फ गांधी हे गांधी मुझको माफ करो, मै झूठ नहीं लिख पाउँगा। राष्ट्रपिता कहने से पहले, अपनी नजरों में गिर जाऊँगा।। माना आजादी के हवनकुंड में, तुमने भी था हव्य चढ़ाया। लाठी खायी जेल गए थे, सत्याग्रह उपवास कराया।। छलछंद खेल कर किसने, सुभाष का निष्कासन करवाया था? तुम नेहरू से नेह कर रहे, हमने योद्धा वीर गंवाया था।। भगत सिंह से क्रांतिपुत्र, क्यों तुमको बागी लगते थे? झूल गये फांसी के फंदे, क्यों तुमको दागी लगते थे?? जलियांवाला बाग़ की ज्वाला, समझा तुमने फ़ाग था जी। लगता है कि मन मंदिर में, बैठा जहरीला नाग था जी? भारत माता के टुकड़े तुमने, नेहरू हेतु करा डाला। और बहा घड़ियाली आँसू, सांपो को यहाँ बसा पाला।। भगवा तुम्हे खटकता था, और हरा हो गया प्यारा जी। बकरी बनी तुम्हारी माता, गाय विदेशी चारा जी।। पय पान कराती गाय यहाँ, बूचड़खाने में कट जाती है। गांधी तेरी अहिंसा आखिर, किस कोने में मर जाती है।। है आ गया जन्म दिन दोबारा, झूठे ढोल ढपोल बजेंगे। तकली से तलवार हराने के, कायर गीदड़ शोर मचेंगे।। चतुर गीदड़ों की कायरता, अहिंसा का झूठा मंत्र बनी। गीता के मंत्र पढ़े ...

भूलने वाली दवाई

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"भूलने वाली दवाई " मोहन की दवा की दुकान थी और उसदिन दुकान पर काफी भीड़ थी वो ग्राहको को दवाई दे रहा था.. दुकान से थोड़ी दूर पेड़ के नीचे वो बुजुर्ग खड़े थे मोहन की निगाह दो तीन बार उन बुजुर्ग पर पड़ी तो गौर से देखा उनकी निगाह दुकान की तरफ ही थी मोहन ग्राहकों को दवाई देता रहा लेकिन उसके मन में उस बुजुर्ग के प्रति जिज्ञासा भी थी कि वो वहां खड़े खड़े क्या देख रहे है जब ग्राहक कुछ कम हुए तो मोहन ने दुकान का काउंटर दुकान में काम करने वाले लड़के के हवाले किया और उस बुजुर्ग के पास गया.. मोहन ने पूछा..क्या हुआ बाउजी जी कुछ चाहिए आपको.. मैं काफी देर से आपको यहां खड़े देख रहा हूं गर्मी भी काफी है इसलिए सोचा चलो मैं ही पूछ लेता हूं आपको क्या चाहिए... बुजुर्ग पहले इस सवालपर कुछ सकपका से गए फिर हिम्मत जुटा कर उसने पूछा...बेटा ..वो काफी दिन हो गए मेरे दो बेटे हैं दोनो दूसरे शहर में रहते है हरबार गर्मी की छुट्टियों में बच्चों के साथ मिलने आ जाते हैं इसबार उन्होंने कहीं पहाड़ों पर छुट्टियां मनाने का निर्णय लिया है बेटा इसलिए इस बार वो हमारे पास नही आएंगे यह समाचार मुझे कल शाम को ही मिला.. कल स...